लोगों को ताज्जुब होगा कि अशफाक उल्ला को शुरू में क्रांति के बारे में कुछ भी नहीं पता था। जब वह शाहजहांपुर के मिशन स्कूल में कक्षा 7 में पढ़ रहे थे तो मैनपुरी षड्यंत्र केस चल रहा था। एक दिन उनके स्कूल में ही कक्षा 10 में पढ़ने वाले राजाराम भारतीय की गिरफ्तारी हो गई।
गिरफ्तारी के समय अशफाक चुपचाप अपनी कक्षा में बैठे थे। पर, पता नहीं उनके दिल में इस घटना से कैसी हलचल मच गई। तभी बंगाल में कन्हाई लाल दत्त और खुदीराम बोस की कुर्बानी ने अशफाक को और हिला दिया। इसी बीच उनके नगर के रामप्रसाद बिस्मिल की भी पुलिस को तलाश होने की जानकारी उन्हें लगी।
इन घटनाओं ने अशफाक को सोच में डाल दिया। वह हर वक्त सोचा करते कि ये थोड़े से युवक टोपीदार बंदूक या गोलों से भला ब्रिटिश हुकूमत को कैसे हटा सकते हैं। कई बार उन्हें लगता कि नौजवानों का गरम खून है। जोश है पर, सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं।‘अशफाक उल्ला और उनका युग’ किताब के एक संस्मरण से पता चलता है, ‘अशफाक को बचपन से ही तैरने, खेलने और निशानेबाजी का शौक था।