बाराबंकी और लखनऊ के बाहरी क्षेत्रों के जिन गांवों को एलडीए अपनी सीमा में लेना चाहता है, उनमें अब जमीन की खरीद-फरोख्त लोगों के लिए रिस्की हो सकता है।
भविष्य में जब इस भूमि का जोनल प्लान (लेआउट) प्राधिकरण तय करेगा, तो संभव है कि जिस जमीन को खरीदा जाए, वह नियोजन के हिसाब से सड़क या फिर किसी अन्य जनसुविधा का हिस्सा हो।
ऐसे में बने हुए मकानों तक का अर्जन किया जाएगा।
कुछ इसी तरह की समस्या गोमती नगर विस्तार की हाउसिंग सोसाइटियों के साथ हो चुकी है। यहां अर्जन के बाद बड़ी संख्या में पक्के मकानों तक को ढहाया गया है।
ऐसे में प्राधिकरण की ओर से सलाह दी जा रही है कि इन गांवों में जमीन के दाम बढ़ेंगे...ऐसे किसी झांसे में न आएं लोग।
वरना उनको भारी नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है।
राजधानी की सभी तहसीलों से लेकर बाराबंकी तक के 600 से अधिक गांवों में मानचित्र पास करने का हक हासिल करने के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण ने जोरदार कोशिशें शुरू कर दी हैं।
इन गांवों में से बाराबंकी के 225 गांवों का प्रकरण तो शासन पहले ही फाइनल कर चुका है।
जबकि, राजधानी के ऐसे गांव जो अब तक एलडीए के कार्यक्षेत्र में शामिल नहीं थे, उनको अब शामिल किया जाएगा।
इन गांवों की संख्या लगभग 400 है।
पुराने गांव जहां अब आबादी हो चुकी है, उनको प्राधिकरण में शामिल करने का अर्थ है कि उनमें भविष्य में जो भी मानचित्र पास किए जाएंगे, उनको एलडीए ही पास करेगा।
जिला पंचायत का उस पर कोई भी अख्तियार नहीं है।
खासतौर पर लखनऊ की बख्शी का तालाब, मोहनलालगंज और मलिहाबाद, जबकि बाराबंकी की फतेहपुर और नवाबगंज तहसीलों के उन गांवों में जमीन खरीदना खतरनाक हैं।
जहां एलडीए पहुंच रहा है। अब प्रापर्टी डीलर एलडीए की जद में आने के नाम पर यहां काफी महंगी कीमत पर जमीन बेचने की तैयारी में लगे हुए हैं।
वे लोगों को लालच दे रहे हैं कि आने वाले समय में प्राधिकरण की सीमा में ये गांव आ जाएंगे, जिससे जम कर दाम बढ़ेगा और उनका फायदा होगा। मगर यह बात इतनी सच भी नहीं है।
इसकी आड़ में प्रॉपर्टी डीलर अवैध प्लॉटिंग को भी हवा दे रहे हैं। जो कि प्राधिकरण से बिना लेआउट पास किए कराई जा रही है। यह पूरी तरह से अवैध है।