राजनीति में कोई शिष्टाचार नहीं होता, सब अपने मतलब की भाषा बोलते हैं, पर कांग्रेस की मदद करने को शिष्टाचार कहने वाली सपा खुद ही अपनी सफाई में उलझ गई है।
पिछले वर्ष पार्टी ने फैसले को राजनीतिक शिष्टाचार बताते हुए बचाव किया था और राजनीतिक उदारता बताते हुए अपने हाथ अपनी पीठ थपथपाई थी।
उस समय कुछ लोगों ने इसे सपा मुखिया का बड़ा मन व बड़ा दिल बताया था। अब वही मानक उसकी कसौटी बन गए हैं, जिन पर खरा उतरना फिलहाल सपा के लिए आसान नहीं है।
पिछले वर्ष दिसंबर में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य रशीद मसूद की सदन की सदस्यता निरस्त होने से रिक्त सीट पर उपचुनाव में सपा ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था।
अंतिम तारीख पर कांग्रेसी ने भरा पर्चा
नामांकन की अंतिम तारीख को अचानक कांग्रेस के प्रमोद तिवारी ने परचा दाखिल किया। कोई दूसरा उम्मीदवार न होने से वह निर्विरोध निर्वाचित हो गए।
लोगों के सवाल उठाने पर सपा की तरफ से कांग्रेस से कोई साठगांठ से इन्कार किया गया था। यह तर्क दिया गया कि उप चुनाव वाली सीट चूंकि कांग्रेस की थी।
इसलिए राजनीतिक शिष्टाचार के तहत सपा ने उम्मीदवार नहीं उतारा। सपा की तरफ से यह तर्क भी दिया गया था कि राजनीति में पक्ष व विपक्ष के बीच इतना शिष्टाचार जरूरी है।
शायद तब सपा ने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही फैसला उसकी कसौटी बन जाएगी।
फिर वैसा ही मौका
रशीद मसूद की सीट रिक्त होने से खाली सीट के चुनाव में फिर वैसी ही स्थितियां सामने हैं। बसपा से राज्यसभा सदस्य प्रो. एसपी सिंह बघेल के त्यागपत्र से रिक्त सीट पर 19 जून को चुनाव होना है।
प्रो. बघेल ने भाजपा में शामिल होते वक्त राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। अब सवाल यह उठ रहा है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव क्या पहले जैसा ही राजनीतिक शिष्टाचार निभाएंगे और यह सीट बसपा के कोटे में देंगे।
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन कहते हैं कि सपा का कोई सिद्धांत नहीं है। वह सुविधा की भाषा बोलती है।