विधानसभा चुनाव से पहले दलितों को लुभाने की जंग में सपा भी शामिल हो गई है। शुरुआती दौर में एक दर्जन मंडलों में दलित सम्मेलन करने की तैयारी है।
इसकी शुरुआत 21 जून को आजमगढ़ से हो सकती है। इसका समापन डॉ. अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर 6 दिसंबर को लखनऊ में राष्ट्रीय स्तर के दलित सम्मेलन से होगा।
यूं तो प्रदेश में सुरक्षित सीटों से सर्वाधिक विधायक सपा के हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर दलित उसके एजेंडे में शामिल नहीं हैं। अब पार्टी के अनुसूचित जाति, जनजाति प्रकोष्ठ के जरिये दलितों को जोड़ने की पहल की जा रही है।
10 जून को सपा मुख्यालय में अनुसूचित जाति, जनजाति प्रकोष्ठ की बैठक में इसकी रणनीति बनेगी। प्रकोष्ठ के अध्यक्ष और सैदपुर (गाजीपुर) से विधायक सुभाष पासी ने बताया कि बैठक में दलितों को सपा से जोड़ने की रणनीति और मंडल स्तरीय दलित सम्मेलनों के आयोजन पर विचार किया जाएगा।
हर विधानसभा में दो से पांच हजार वोट
बकौल सुभाष पासी, दलितों में सोनकर, धनगर, सरोज, रावत, पासवान, वाल्मीकि, सुमन समेत 16 से ज्यादा जातियां हैं।
प्राय: हर विधानसभा क्षेत्र में इनके दो से पांच हजार तक वोट हैं। सपा की कोशिश है इन उपेक्षित दलित जातियों को पार्टी से जोड़ा जाए। इसके लिए कार्यकर्ता दलित बस्तियों तक जाएंगे।
उनकी समस्याओं का समाधान कराएंगे। कोशिश है कि सपा संगठन में बूथ स्तर पर दलितों को प्रतिनिधित्व मिले।
सरकारी योजनाओं की देंगे जानकारी
दलितों को कमजोर वर्गों के लिए चलाई जा रही योजनाओं जानकारी के साथ ही उन्हें इनका लाभ भी दिलाया जाएगा। इन योजनाओं की पुस्तिकाएं छपवाकर उनके बीच वितरित की जाएंगी।
बसपा, भाजपा, कांग्रेस की है दलितों पर नजर
प्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति की आबादी 23 फीसदी से ज्यादा है। इसीलिए बसपा के साथ ही भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने तरीके से दलितों को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। डॉ. अंबेडकर जयंती पर इन पार्टियों में दलित हितैषी बनने की होड़ सी दिखी।
बसपा का मुख्य आधार हैं दलित
दलित बसपा का बेस वोट माने जाते हैं। इन्हें जोड़ने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी संस्थापक कांशीराम के साथ लंबा संघर्ष किया है। राष्ट्रीय राजनीति में मायावती की पहचान भी दलित लीडर के रूप में है।
बसपा सरकार और संगठन के कामकाज में दलितों को प्राथमिकता पर रखा जाता है। पिछले कुछ वर्षों से दलित वोटों का सबसे बड़ा शेयर बसपा के खाते में जा रहा है।
भाजपा चाहती है दलितों को जोड़ना
भाजपा की कोशिश है कि दलित वोटों में उसकी ठीक-ठाक सेंधमारी हो। लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का एक हिस्सा मिलने से भाजपा उत्साहित भी है। शायद इसीलिए डॉ. अंबेडकर जयंती पर उसने समरसता सप्ताह आयोजित किया। वहीं, दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले लक्ष्मण आचार्य को विधान परिषद भेजा।
दलितों की वापसी को छटपटा रही कांग्रेस
कांग्रेस भी लंबे समय तक अपना वोट बैंक रहे दलितों की वापसी के लिए छटपटा रही है। इसीलिए उसने दलित कार्ड खेलते हुए पीएल पूनिया को राज्यसभा में भेजा।
पिछले दिनों प्रियंका वॉड्रा ने रायबरेली के दो दर्जन गांवों के तूफानी दौरे में दलितों से संवाद को प्राथमिकता दी। राहुल गांधी भी दलितों को साधने के लिए ही गत दिनों डॉ. अंबेडकर के पैतृक गांव महू गए थे।