मलिन बस्ती के बच्चों को हिंदी पढ़ाते सोमनाथ कश्यप और उनकी टीम
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जेएनपीजी कॉलेज से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रहे 24 वर्षीय सोमनाथ कश्यप के लिए समाजसेवा बंदगी से कम नहीं है तो हिंदी मानो उनकी जिंदगी है। वे अपनी पढ़ाई के साथ मलिन बस्तियों व झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को भी पढ़ाते हैं। इसके लिए उनके पास जुझारू युवाओं की टीम है।
‘बदलाव-एक कदम शिक्षा की ओर’ संस्था के माध्यम से इन युवाओं की टीम आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को शिक्षा के साथ ही भोजन की भी व्यवस्था कराती है। कोरोना संक्रमण के चलते जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो सोमनाथ की टीम ने इन बस्तियों में पूरी सावधानी बरतते हुए न सिर्फ भोजन व जरूरी सामान की आपूर्ति जारी रखी बल्कि बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला भी नहीं टूटने दिया। उनकी टीम में शामिल अभय सिंह, आकाश पाल, आनंद कश्यप, सतीश गुप्ता, जाह्नवी कुमार, संदीप सिंह, अमरपाल सिंह, सागर कुमार और पल्लवी सिंह मिलकर हिंदी में शिक्षा का उजाला इन बस्तियों तक पहुंचा रहे हैं।
बीए प्रथम वर्ष में डाली संस्था की नींव
बीए प्रथम वर्ष में डाली संस्था की नींव सोमनाथ ने बताया कि हिंदी से प्रेम के चलते वर्ष 2015 में जब वे बीए प्रथम वर्ष के छात्र थे, तभी अपने कुछ साथियों के माध्यम से उन्होंने ‘बदलाव-एक कदम शिक्षा की ओर’ संस्था की शुरूआत की। आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा सक्षम न होने के बावजूद सभी के सहयोग से उन्होंने सबसे पहले मलिन बस्तियों के ऐसे बच्चों को हिंदी सिखाने का बीड़ा उठाया जो कभी स्कूल गए ही नहीं थे।
कविताओं और गीतों में पिरोते हैं अपने भाव
बच्चों को पढ़ाते हुए
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सोमनाथ स्वयं एक कवि हैं जो अपने भावों को अपनी कविताओं और गीतों में पिरोते हैं। काव्य मंचों पर प्रस्तुति भी देते रहते हैं। उनकी कविताओं में ज्यादातर मानव मन की पीड़ा और समाज का दर्द छलकता है। हिंदी पर अपने उद्गार सोमनाथ कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं
- भारत की भाषा का आधार हिंदी, जन मन के भावों का उद्गार हिंदी, बोली अनेकों हैं मिलकर जिएं हम, भारत में सबको स्वीकार हो हिंदी।
हिंदी कविताओं को बनाया शिक्षा का जरिया
सोमनाथ बताते हैं कि उनकी हिंदी में रुचि कक्षा 9 से ही हो गई थी। हिंदी के अध्यापक दिनेश कुमार पाठक हमें कविताओं और कहानियों के माध्यम से हिंदी पढ़ाते थे जिससे हिंदी के प्रति लगाव बढ़ता गया। बाद में कविताएं लिखने की भी शुरूआत हो गई तो मैंने भी बच्चों को पढ़ाने के लिए हिंदी कविताओं का सहारा लिया।
सोमनाथ बताते हैं कि वे बच्चों को मुंशी प्रेमचंद की कहानियां सुनाते हैं तो वहीं हिंदी साहित्यकारों की कविताएं भी उन्हें सिखाते हैं। आज स्थिति ये है कि झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को भी कबीर, नागार्जुन, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, गोपालदास नीरज, डॉ. कुमार विश्वास, मैथलीशरण गुप्त और महादेवी वर्मा जैसे साहित्याकारों की रचनाएं कंठस्थ हो गई हैं। यही नहीं हिंदी साहित्यकारों के जन्मदिवस पर इन बस्तियों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और उनके बारे में बच्चों को हम जानकारी देते हैं।
भारत भारती को हम सगर्व अपनाएं
डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित
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हिंदी भारत की आबरू है। समूचे देश को जोड़ने की कड़ी है। यह कौशल विकास का माध्यम बनेगी तो मौलिक चिंतन होगा। रोजगार एवं मानुष भाव बढ़ेगा। साथ ही हम आत्मनिर्भर होंगे और सच्चा जनतांत्रिक संवाद स्थापित होगा। नए राष्ट्र के निर्माण में राष्ट्र भाषा की महती भूमिका होगी। इस भारत भारती को हम सगर्व अपनाएं और आगे बढ़ाएं। ‘हिंदी हैं हम’ अभियान बेहद कारगर साबित हो रहा है। मेरी लोगों से अपील है कि वे इस अभियान से जुड़कर हिंदी को गौरवान्वित करें। - डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित, वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी, लखनऊ विश्वविद्यालय
देश की पहचान है हिंदी
डाॅ विजय नारायण तिवारी
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हिंदी न केवल एक भाषा है वरन देश की सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान भी है। इसलिए हिंदी के प्रयोग के प्रति हमारे मन में गौरव बोध का भाव होना चाहिए। हिंदी न केवल साहित्य सृजन के लिए बल्कि जन भाषा के रूप में सबसे उपयुक्त भाषा है। अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की सार्थकता और उपयोगिता को लेकर काफी आश्वस्त हूं। निश्चित रूप से यह शृंखला बहुत उपयोगी साबित होगी। - डॉ. विजय नारायण तिवारी, पूर्व वरिष्ठ हिंदी अधिकारी, केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान।
हिंदी से जुड़ने को नए तरीके तलाशें
डॉ अशोक अज्ञानी
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अधिकतर लोग हिंदी को आसान समझकर उसके अध्ययन व अध्यापन में समुचित श्रम नहीं करते। कुछ लोग अपने को आधुनिक दिखाने के मोहपाश में अपने घर में भी हिंदी बोलने से बचते हैं तो वहीं कई अंग्रेजी के सहारे हिंदी बोलने की कोशिश करते हैं। यही सब हिंदी की उपेक्षा के कारण हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम पुन: हिंदी से जुड़ने के लिए नए तरीके तो तलाशें ही, साथ में पुरानी परंपराओं को भी अपनाएं। इस दिशा में ‘हिंदी हैं हम’ बहुत लाभदायक सिद्ध होगा। - डॉ. अशोक अज्ञानी, वरिष्ठ साहित्यकार