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कोर्ट ने मामले को विरल से विरल माना: छह साल की मासूम से दुष्कर्म-हत्या में मामा को फांसी की सजा

Wed, 16 Mar 2022 06:48 PM IST
ishwar ashish अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले को विरल से विरलतम मानते हुए छह साल की मासूम से दुष्कर्म-हत्या के आरोपी को फांसी की सजा सुनाई है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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करीब छह साल की भांजी की दुष्कर्म के बाद हत्या के आरोपी को दोषी ठहराते हुए पॉक्सो के विशेष न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्र ने मंगलवार को फांसी की सजा सुनाई। कोर्ट ने सजा दिए जाने वाली पत्रावली को मृत्युदंड की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट भेजने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट से सजा की पुष्टि होने तक आरोपी को मृत्युदंड न देने का भी आदेश दिया है।

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अदालत में सरकारी वकील दुर्गेश नंदिनी, अभिषेक उपाध्याय और सुखेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि छह अप्रैल 2004 को वादी ने हसनगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें बताया था कि पांच अप्रैल को उसकी नातिन गायब हो गई, जिसकी सूचना पुलिस को दी गई। परिवार के लोग बच्ची को मोहल्ले में ढूंढ रहे थे कि रात 2.20 बजे वादी का भांजा बच्ची को गोद मे लेकर आया। देखा तो बच्ची के दोनों हाथ बंधे थे और हाथ की नस कटी हुई थी और उसकी मौत हो गई थी। मामा ने बताया कि बच्ची शाह दोषी की मजार के गेट पर मिली थी। इसके बाद वादी ने दूसरी रिपोर्ट दर्ज कराकर बच्ची के मामा पर आरोप लगाया कि उसने ही उनकी नातिन से दुष्कर्म करके हत्या की है।

पुलिस ने विवेचना की तो पता चला कि मजार के पास शादी समारोह चल रहा था। ढूंढने पर यहां न तो बच्ची और न ही खून के निशान मिले थे। इस पर पुलिस को बच्ची के मामा पर शक हुआ। पूछताछ पर उसने बताया कि वह आइसक्रीम दिलाने के बहाने बच्ची को ले गया और उसके साथ दुष्कर्म कर मौत के घाट उतार दिया। पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी।
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कोर्ट ने यह भी कहा...
अदालत ने सजा सुनाते हुए कहा कि दिल्ली के निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म के मामलों में अपराधी को मृत्युदंड के लिए जनांदोलन हुआ था। इस पर दुष्कर्म के बाद हत्या जैसे मामलों में इसका प्रावधान किया गया। वहीं, हैदराबाद में युवती से दुष्कर्म के बाद हत्या और शव जलाने जैसे अपराधों में मृत्युदंड की मांग देश भर में की गई। मामले में आरोपियों के फरार होने की कोशिश के दौरान पुलिस ने उनका एनकाउंटर किया तो समाज के एक बड़े वर्ग ने इसकी सराहना की थी, जिससे पता चलता है कि समाज ऐसे अपराधों में मृत्युदंड का पक्षधर है। कोर्ट ने आगे कहा कि निर्भया और हैदराबाद मामले में पीड़िता वयस्क थी, जबकि इस मामले में वह 5 वर्ष 9 माह और 25 दिन की अबोध थी। कोर्ट ने इस मामले को विरल से विरलतम मानते हुए कहा कि इस अपराध से पीड़िता के परिवार, समाज में उत्पन्न डर व अविश्वास को देखते हुए आरोपी को आजीवन कारावास से दंडित करना काफी नहीं होगा, लिहाजा उसे मृत्युदंड दिया जाता है।

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