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श्रवण साहू हत्याकांड: अकील ने नहीं छोड़ा था कोई सुबूत, महिला मित्रों ने सीबीआई के सामने खोले राज

Sat, 24 Aug 2024 04:29 PM IST
ishwar ashish अशोक मिश्रा, अमर उजाला, लखनऊ

सार

लखनऊ के श्रवण साहू हत्याकांड के खुलासे में सीबीआई जांच की राह आसान नहीं रही। मामले में सत्यम व अजय पटेल की महिला मित्रों के बयान से घटना का खुलासा हुआ।
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श्रवण साहू (फाइल फोटो) अकील, सत्यम और अजय। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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राजधानी लखनऊ के श्रवण साहू हत्याकांड की सीबीआई जांच की राह आसान नहीं रही। सीबीआई की स्पेशल क्राइम ब्रांच ने हाईकोर्ट के आदेश पर जांच शुरू की तो मुख्य आरोपी अकील के खिलाफ कोई सुबूत हाथ नहीं लगा। जेल में बंद अकील ने बेहद शातिराना तरीके से खुद को बचाने के लिए कोई अहम सुराग नहीं छोड़ा था।

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सीबीआई की तफ्तीश आगे बढ़ी तो अकील के साथी सत्यम और अजय पटेल की दो महिला मित्रों का पता चला। सीबीआई ने महीनों की मशक्कत के बाद उन्हें तलाशा, लेकिन वह बयान देने को राजी नहीं हुईं। कई बार प्रयास करने के बाद उनके बयान दर्ज हुए तो पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठने के साथ अकील के मुख्य साजिशकर्ता होने के पुख्ता प्रमाण मिलते चले गए।

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स्पेशल क्राइम ब्रांच के तत्कालीन डिप्टी एसपी ने दिल्ली में सत्यम की महिला मित्र को तलाशा तो पता चला कि घटना को अंजाम देने के बाद वह अजय के साथ उसके पास गया था। तब तक महिला मित्र को घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। सीबीआई ने दिल्ली में सत्यम की महिला मित्र का पता लगाया और उसे बयान देने के लिए राजी किया। उसने सीबीआई को बताया कि दिल्ली के उसके घर में सत्यम यू-ट्यूब पर श्रवण साहू हत्याकांड से जुड़ी खबर को देख रहा था। यह देखकर वह चौंक गई क्योंकि जब वह लखनऊ में सत्यम के साथ रहती थी, तब अकील व अन्य साथी श्रवण साहू को ठिकाने लगाने की साजिश रच रहे थे।

उसने सीबीआई को बताया कि अकील ने सत्यम को उसके सामने अखबार में लपेटकर एक पिस्टल भी दी थी। इसके बाद सीबीआई ने लखनऊ में सत्यम के मकान मालिक और पड़ोसियों से पूछताछ की तो सारा राज खुलता चला गया। महिला मित्र और पड़ोसियों ने जब शूटरों की फुटेज देखी तो उन्होंने सबको पहचान लिया।

सत्यम से हुआ था झगड़ा
महिला मित्र ने बताया कि सत्यम और अजय पटेल देह व्यापार और हथियारों को बेचने का काम करते थे। इसकी जानकारी मिलने पर उसका सत्यम से झगड़ा हुआ था, जिसके बाद वह दिल्ली आ गई थी। सत्यम के घर के पास ही अजय पटेल भी अपनी महिला मित्र के साथ रहता था, जबकि अकील भी दूसरे केस में जमानत पर छूटने के बाद सत्यम के घर पर आकर रहने लगा था। अकील के साथ उसका ड्राइवर बाबू खां और रोहित मिश्रा भी रहते थे। जबकि फैजल, विवेक आदि साथी लगातार आते रहते थे। इसके बाद सीबीआई ने सत्यम और अजय के घर पर खाना बनाने वाले युवक को तलाशा। उसने भी फुटेज से अकील के सभी साथियों की शिनाख्त कर दी। इसके बाद सीबीआई ने केस में फैजल और बाबू खां को भी आरोपी बनाया। वहीं रोहित मिश्रा ने बयान दिया कि वह भी अकील के इशारे पर श्रवण साहू की रेकी करने गया था। उसने सत्यम के घर पर श्रवण साहू को ठिकाने लगाने की साजिश रचे जाने की बात भी कबूली।

चोरी की थी पिस्टल
जिस पिस्टल से श्रवण साहू की हत्या की गई, उसे चोरी किया गया था। वह किसी मुस्लिम युवक की थी, जिसने घटना के दो माह पहले चोरी का केस भी दर्ज कराया था। सीबीआई का शक उस पर भी गया, लेकिन अकील से उसका कोई कनेक्शन नहीं मिला। हालांकि उसने जिन परिस्थितियों में पिस्टल चोरी होने की बात मुकदमे में बताई थी, वह आज भी सीबीआई के लिए रहस्यमय बनी हुई है। सीबीआई जांच में यह भी सामने आया कि अकील ने जेल में रहते हुए अपने साथी राज सिंह को किसी की हत्या करने के लिए पैसों के साथ पिस्टल भी दी थी। यह भी पता चला कि घटना के कुछ दिन पहले अकील के साथियों ने श्रवण साहू को रास्ते में रोककर पिस्टल लगाकर अपने बेटे की हत्या के मुकदमे की पैरवी नहीं करने के लिए धमकाया भी था।

एसएसपी ने की थी लापरवाही
सीबीआई ने जांच के दौरान श्रवण साहू को गनर मुहैया कराने में देरी करने पर तत्कालीन डीएम जीएस प्रियदर्शी और एसएसपी मंजिल सैनी से भी पूछताछ की थी। हालांकि जीएस प्रियदर्शी करीब एक हफ्ता पूर्व ही डीएम बने थे और गणतंत्र दिवस के आयोजन की तैयारियों में व्यस्त थे। सीबीआई ने पाया कि एसएसपी मंजिल सैनी ने श्रवण साहू को गनर देने की अनुमति प्रदान करने के लिए डीएम से मिलकर पैरवी नहीं की। इसी वजह से सीबीआई ने राज्य सरकार से उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने की सिफारिश की थी। इसकी जांच एडीजी अभिसूचना भगवान स्वरूप को सौंपी गई थी। इसमें बाद में मंजिल सैनी को क्लीन चिट मिल गई।

20 मीटर की दूरी पर रहती थी पुलिस
श्रवण साहू की जान पर खतरा होने की वजह से स्थानीय पुलिस ने उनके घर के पास सुरक्षा मुहैया कराई थी। श्रवण के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर उनके छोटे बेटे सुनीत का मेडिकल स्टोर था। घर व दुकान के बीच स्थित चौराहे पर 3-4 पुलिसकर्मी मौजूद रहते थे। हालांकि शूटरों ने बेखौफ होकर श्रवण साहू की हत्या कर दी थी। फुटेज से पता चला था कि दोनों शूटरों ने हेलमेट भी श्रवण साहू के घर के बाहर आने के बाद पहना था।

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पुलिस के लिए मुखबिरी करते-करते बना लिया था पूरा गैंग

श्रवण साहू व उनके बेटे आयुष की हत्या का मुख्य दोषी अकील अंसारी बेहद शातिर था। सीतापुर से करीब तीन दशक पहले वह अपनी मां के साथ लखनऊ आया और ठाकुरगंज के हसियामऊ में रहने लगा। खराब संगत की वजह से वह मनबढ़ हो गया। वर्ष 2009 के आसपास उसने कुछ पुलिस वालों से दोस्ती भी कर ली थी। उनके लिए मुखबिरी की और देखते ही देखते अपना गैंग बना लिया था।

मनबढ़ होने के चलते ही अकील ने मामूली बात पर आयुष की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद उसको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। वहां उसकी मुलाकात सीरियल किलर भाइयों सलीम, रुस्तम व सोहराब के गुर्गों से हुई थी। सीरियल किलर भाइयों से मनमुटाव के बाद अकील ने अपना गैंग बना लिया था और माफिया मुख्तार अंसारी व मुन्ना बजरंगी के लिए रंगदारी वसूलने लगा था।

चहेते पुलिस वालों पर करता था खर्च
सूत्र बताते हैं कि ठाकुरगंज थाने की एक पुलिस चौकी पर पूर्व में तैनात दरोगा से अकील के करीबी संबंध थे। इसका खुलासा होने पर दरोगा को निलंबित कर दिया गया था। अवैध जमीनों की कमाई वह पुलिसकर्मियों पर लुटाता था। इसके चलते ठाकुरगंज, पारा, सआदतगंज और तालकटोरा के अलावा कई थानों में अकील ने अच्छी पकड़ बना ली थी। इसी नेटवर्क के चलते श्रवण साहू को फर्जी केस में जेल भेजने के लिए अपने खास पुलिस वालों के साथ मिलकर साजिश रची थी, पर ये नाकाम हो गई थी। मामले में 14 पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी।

बर्खास्त सिपाही धीरेंद्र यादव चला रहा था वसूली का गैंग
श्रवण साहू को झूठे मामले में फंसाने का आरोपी बर्खास्त सिपाही धीरेंद्र यादव जेल से बाहर आने के बाद वसूली का गैंग चलाने लगा था। कुछ दिन पहले उसने अपने गैंग के लोगों के साथ मिलकर एक कपड़ा कारोबारी को अगवा कर रंगदारी मांगी थी। गैंग में आपस में विवाद हो गया था और मामला खुल गया था। हसनगंज थाने में केस दर्ज कर धीरेंद्र यादव को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उसके गैंग के खिलाफ गैंगस्टर के तहत कार्रवाई भी की थी।

पुलिस सूत्रों की माने तो श्रवण साहू को झूठे मामले में फंसाने में दरोगा धीरेंद्र शुक्ला, सिपाही धीरेंद्र यादव और अनिल सिंह की प्रमुख भूमिका था। इन्हीं तीनों पुलिस वालों ने अकील के चार साथियों कामरान, अफजल, तमीन और अनवर को शूटर बताकर असलहे संग फर्जी ढंग से जेल भेज दिया था। चार युवकों पर श्रवण साहू से अकील की हत्या के लिए 30 लाख रुपये सुपारी लेने का झूठा आरोप लगाया गया था। केस दर्ज होने के बाद ही पुलिस वालों और अकील के गठजोड़ का पर्दाफाश हो गया था। चारों युवकों के परिजनों की तहरीर पर अलग-अलग थाने में पुलिस वालों सहित अकील व उसके साथियों पर केस दर्ज किया गया था। तीनों पुलिस वालों को बर्खास्त कर दिया गया था और सभी को जेल जाना पड़ा था।
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