पहले बात परिणामों की तो नतीजों से भाजपा और सपा दोनों की मंशा पूरी होती दिख रही है। भाजपा ने प्रदेश की सियासत के चर्चित किरदारों में शुमार पूर्व मंत्री व पूर्व सांसद नरेश अग्रवाल के पुत्र व सपा के बागी नितिन अग्रवाल को विधानसभा उपाध्यक्ष निर्वाचित कराकर एक तरह से केंद्र और प्रदेश में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तर प्रदेश के वैश्यों में से किसी को जगह न मिल पाने की भरपाई करने का संदेश दिया है। हालांकि दोनों जगह मंत्रिमंडल में पहले से वैश्यों का प्रतिनिधित्व है, लेकिन विस्तार में जगह न मिलने से भाजपा को लग रहा था कि कहीं विपक्ष इसको लेकर सवाल न खड़ा करने लगे।
नितिन को उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने वैश्यों को पूरा सम्मान देने के साथ अपने दलों को छोड़कर साथ आने वालों का ख्याल और समायोजन की चिंता का संदेश देने के साथ विकल्प तलाश रहे नेताओं को मूक आमंत्रण भी दिया है। कहा जा सकता है कि भाजपा के साथ बसपा के अनिल सिंह, कांग्रेस के राकेश सिंह व अदिति सिंह और रालोद व निर्दलीय भी हैं, फिर नितिन को ही क्यों?
इसका उत्तर सिर्फ इसी से मिल जाता है कि सदन में संख्या के लिहाज से भाजपा के बाद सपा ही आती है। फिर नितिन के सहारे भाजपा वैश्यों को संदेश देने के साथ यह भी कहने की स्थिति में आ गई कि उसने मुख्य विपक्षी दल को यह पद दिया। साथ ही सिर पर खड़े विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नरेश जैसे सियासी शख्स के संभावित कदमों से भाजपा की साख पर पड़ने वाले असर को भी टाल लिया है। यही नहीं, ऐसा करके भाजपा ने विपक्ष में बिखराव का भी राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी नेता स्व. चंद्रशेखर अकसर कहते थे कभी-कभी हारकर भी भविष्य में जीत और जनाधार बढ़ाने के समीकरण तलाशे जाते हैं। सपा हार जरूर गई है, लेकिन उसने इस चुनाव के जरिए पिछड़ों के वोट के मुद्दे पर भाजपा को घेरने की बिसात बिछाने की पूरी कोशिश की है। साथ ही नितिन और नरेश का सपा से कोई वास्ता न होने का संदेश भी देने का प्रयास किया है। प्रो. तिवारी की बात सही है।
मौजूदा परिस्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो सपा के लिए ऐसा जरूरी भी हो गया था। सपा के बागी नितिन के भाजपा के समर्थन से उम्मीदवार बनने के बाद भी अखिलेश मुकाबले में किसी को न उतारते तो नकारात्मक संदेश जाता। लोग मानते कि नरेश अग्रवाल के साथ सपा की नरमी में कुछ न कुछ तो जरूर है। यह भी संदेश निकलता कि शायद सपा भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए बचना चाह रही है। जाहिर है कि इसका सपा को राजनीतिक नुकसान ज्यादा होता। चुनाव लड़कर और अपने विधायकों की संख्या से ज्यादा वोट अपने उम्मीदवार को दिलाकर सपा ने यह कहने का आधार तो तलाश ही लिया कि भाजपा का मुकाबला वही कर सकती है।
पार्टी में कोई बिखराव नहीं है। उल्टे दूसरी पार्टी के लोग उससे जुड़ रहे हैं। सपा ने इस चुनाव में भाजपा के समर्थन से मैदान में उतरे वैश्य उम्मीदवार नितिन के मुकाबले अपना कुर्मी प्रत्याशी दिया। जाहिर है कि अखिलेश ने इस चुनाव के जरिये गैर यादव पिछड़ों को भी सपा में महत्व देने के साथ सियासी बिसात पर भाजपा को उसी के कोर वोट कुर्मियों के बीच घेरने के मोहरे बैठाने की कोशिश की है। आज बिछाई गई बिसात के दांवपेंच की झलक आने वाले दिनों में सियासी मंचों से दिखेगी।
कांग्रेस और बसपा ने इस चुनाव में मतदान से दूर रहकर एक तरह से चुनावी दहलीज पर खड़े प्रदेश में अपने बिखराव की यादें ताजा होने से रोकने की कोशिश की है। दोनों पार्टियों के नेताओं को यह हकीकत मालूम ही थी कि उनके पास इतने विधायक नहीं है, जिनके आधार पर वे इस चुनाव में कोई निर्णायक भूमिका निभा सकें।
उल्टे यह खतरा जरूर था कि पार्टी से रिश्ता तोड़ चुके विधायकों के अलावा एक-दो अन्य ने भी कहीं इस मौके पर पाला बदल लिया तो चुनावी माहौल बनाने की कोशिशों पर पानी फिर सकता है। इसलिए दोनों दलों ने फिलहाल अपनी मुट्ठी को खोलने के बजाय बंद रखना ही मुनासिब समझा।
रही बात अन्य कुछ विधायकों के मतदान से गैरहाजिर रहने की तो यह भी काफी महत्वपूर्ण है। संकेत साफ है कि प्रदेश में अभी कुछ विधायक सियासी हवा का रुख भांप रहे हैं। जो आने वाले दिनों में पाला बदल के रूप में सामने आएगा। इसलिए इन लोगों ने आज मतदान से गैरहाजिर रहकर नई विधानसभा में अपनी हाजिरी सुनिश्चित करने के समीकरणों पर काम करने का विकल्प बचाए रखने की कोशिश की है।