वर्ष 2014-15 में समाज कल्याण विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव सुनील कुमार ने तकनीकी व व्यावसायिक संस्थानों में इस सुविधा का लाभ पाने वाले टॉप-20 संस्थानों की सूची निकाली थी। इन निजी संस्थानों में 80 फीसदी से अधिक छात्र एससी-एसटी के दिखाए गए थे। जबकि, सामान्य तौर पर इन दोनों वर्गों के इतनी बड़ी संख्या में छात्र नहीं होते हैं।
जांच में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई थी। जीरो फीस के नियम के चलते फर्जी प्रवेश के आधार अनियमितता करने वाले सहारनपुर, मेरठ और गाजियाबाद जिलों में एसआईटी और ईओडब्ल्यू की जांच अब तक चल रही है।
अब भी हो रही गड़बड़ी की कोशिशें
वर्ष 2018-19 में निजी संस्थानों में जीरो फीस पर प्रवेश की व्यवस्था खत्म कर दी गई है, इसके बावजूद वहां बहुतायत में एससी-एसटी छात्र दिखाकर शुल्क भरपाई योजना का लाभ लेने का प्रयास हो रहा है। कुछ समय पहले राजधानी में आईं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की संयुक्त सचिव स्मिता चौधरी ने भी इन आंकड़ों पर हैरानी जताते हुए संबंधित रिकॉर्ड ले लिया है।
समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने बताया कि वर्ष 2002-03 में तत्कालीन अटल बिहारी सरकार ने पूरे देश में एससी-एसटी छात्रों को निशुल्क प्रवेश की व्यवस्था लागू की थी। अगले ही वित्त वर्ष में यूपी में इस नियम को लागू कर दिया गया।
वर्ष 2014-15 में तत्कालीन सपा सरकार ने निशुल्क प्रवेश की सीमा कुल सीटों के सापेक्ष 40 फीसदी निर्धारित कर दी। 26 नवंबर को संविधान दिवस पर सपा की ओर से होने वाला प्रदर्शन सिर्फ दिखावा है।
मौजूदा प्रदेश सरकार ने सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी वर्ग के 40 प्रतिशत केबजाय शत-प्रतिशत छात्रों को निशुल्क प्रवेश देने का नियम लागू कर दिया है।