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सपा-रालोद : ऊपर गठबंधन, धरातल पर घमासान, पश्चिमी यूपी में कई सीटों पर टिकट के लिए उठापटक

Wed, 19 Jan 2022 04:02 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमित मुद्गल, लखनऊ

सार

हालांकि, रालोद सुप्रीमो चौधरी जयंत ने भावनात्मक अंदाज में अपने समर्थकों को समझाने की कोशिश की है। पर, कई सीटें ऐसी हैं जहां गठबंधन में खूब उठापटक हो रही है। इससे नाराजगी बढ़ रही है।
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सपा-रालोद संग-संग... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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ऊपर तो गठबंधन है। बड़ों में गलबहियां हैं, पर धरातल पर घमासान है। सपा-रालोद गठबंधन में पहले चरण के लिए पश्चिमी यूपी की सीटों पर कुछ ऐसे ही हालात बनने लगे हैं। प्रत्याशियों की घोषणा के बाद धरातल पर रार शुरू हो गई है। हालांकि, रालोद सुप्रीमो चौधरी जयंत ने भावनात्मक अंदाज में अपने समर्थकों को समझाने की कोशिश की है। पर, कई सीटें ऐसी हैं जहां गठबंधन में खूब उठापटक हो रही है। इससे नाराजगी बढ़ रही है।

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 रालोद के हिस्से में अब तक तीस सीटें आई हैं। मंगलवार को भी सिवालखास और मेरठ कैंट सीट पर उम्मीदवार घोषित किए गए। दरअसल, सपा और रालोद के बीच कुछ सीटों पर सिंबल बदलकर चुनाव लड़ने की सहमति बनी है। पर, इसमे सपा का पलड़ा भारी पड़ा है। उसके कई उम्मीदवार रालोद के चुनाव चिह्न से मैदान में उतर रहे हैं। पुरकाजी से अनिल कुमार रालोद के चिह्न पर चुनाव लड़ रहे हैं।

इसी तरह से खतौली से राजपाल सिंह सैनी भी मैदान में उतारे गए हैं। मंगलवार को दो टिकट घोषित किए गए। इनमें सिवालखास सीट पर  सपा के पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद को रालोद के चिह्न पर चुनावी मैदान में उतारा गया है। यहां से टिकट के लिए कई दिनों तक जोर-आजमाइश चलती रही थी। मुस्लिम बहुल इस सीट पर रालोद के थिंक टैंक का मानना था कि यहां जाट व मुस्लिम वोटों का समीकरण रंग ला सकता है। पर, चर्चा यह है कि सपा के दबाव में रालोद इस सीट पर अपना कार्यकर्ता नहीं उतार पाई। जबकि इस सीट पर रालोद का सबसे तगड़ा दावा था।
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यहां उसके पास प्रत्याशियों की भी भरमार थी। ऐसे दावेदार भी थे जो पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं। ऐसे में चिह्न बदलकर प्रत्याशी उतारने का फॉर्मूला कार्यकर्ताओं को हजम नहीं हो रहा है। यहां हंगामा मचा है और स्थिति बगावत जैसी हो गई है। आलम यह है कार्यकर्ताओं ने दिल्ली तक जाकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।  ऐसे में गठबंधन में खटास बढ़ सकती है। कुछ ऐसा ही मथुरा की मांट सीट पर भी नजर  आ रहा है। वहां से एमएलसी संजय लाठर को चुनावी रण में उतारने पर सपा अड़ी हुई है। भले ही रालोद के चिह्न पर ही उन्हें लड़ाना पडे़। जयंत खुद यहां से एक बार चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में इस सीट पर भी सबकी निगाहें हैं। पश्चिमी यूपी में सबको साथ लेकर चलने की कवायद ने भी समीकरणों को उलझा दिया है।

कई सीटों पर कड़े मुकाबले की लिखी जा चुकी पटकथा
रालोद-सपा गठबंधन विभिन्न सीटों पर जहां जाट मुस्लिम समीकरण पर बाजी लगा रहा है, वहीं बसपा ने भी कई सीटों पर इसी समीकरण से उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा भी पीछे नहीं है। बागपत, बड़ौत तथा छपरौली में भाजपा ने जाट उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। तो बसपा ने छपरौली से मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। इस सबसे साफ है कि यहां कड़े मुकाबले की पटकथा लिखी जा चुकी है।

भितरघात की आशंका : सीटों केबंटवारे में जिस तरह से भाजपा के कई टिकटों को लेकर असंतोष के स्वर उठ रहे हैं, आशंका है कि गठबंधन के टिकटों पर भी इसी तरह के स्वर न उठने शुरू हो जाएं। चुनाव में भितरघात की आशंका दोनों दलों के रणनीतिकारों को भी सताने लगी है। यही कारण है कि जयंत चौधरी ने खुद भावनात्मक अपील कर दावेदारों और समर्थकों को समझाने की कोशिश की है।

नाराज दावेदार लड़ सकते हैं दूसरे दलों से
कई सीटें ऐसी हैं जहां टिकट नहीं मिलने से नाराज दावेदार किसी दूसरे दल या फिर निर्दलीय ही चुनावी मैदान में ताल ठोक सकते हैं। टिकट नहीं मिलने की सूचना पर ऐसे उम्मीदवारों के घर लोगों का तांता लग रहा है। कई ने तो बाकायदा क्षेत्र में जाकर लोगों से संपर्क भी किया। गठबंधन में खास तौर पर रालोद इस सब पर नजर रख रहा है। देख रहा है कि कैसे रूठों को मनाया जाए।

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