इस तरह तैयारी
बकौल डॉ. आजमी मुस्लिम मंच के इन सम्मेलनों में मुसलमानों को समझाया जाएगा कि वे मुसलमान का मतलब अपने वतन से मोहब्बत करना है। जब वतन से मोहब्बत करेंगे तभी पूरी तरह शांति आएगी। इसके लिए अपने देश के बुजुर्गों, नबियों और अवतारों की इज्जत करना मुसलमानों का फर्ज है। हर एक को अपने-अपने मजहब के अनुसार, इबादत करने का अधिकार है।
सारी दुनिया यह मानती है कि अयोध्या में ही श्रीराम का जन्म हुआ था। इसलिए इस पर विवाद खड़ा करने का कोई तुक नहीं है। फैसला यदि हिंदुओं के पक्ष में आए तो खुशी के साथ उसे स्वीकार करें। पर, यदि निर्णय मुस्लिमों के पक्ष में आए तो भी यह स्वीकार करते हुए कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था पूरी भूमि मंदिर बनाने के लिए खुशी-खुशी सौ करोड़ से ज्यादा हिंदू भाइयों की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें सौंप देनी चाहिए।
यह महीना पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश का महीना है। इसलिए उनकी तालीम भी याद रखना चाहिए। वह कहते हैं, ‘अल्लाह ने फरमाया है कि वह जमीन पर फसाद और बिगाड़ पैदा करने वालों को हरगिज पसंद नहीं करता। जो शख्स किसी इंसान का नाहक कत्ल करता है अल्लाह मानता है कि उसने पूरी इंसानियत का कत्ल कर दिया।
इसलिए हमलावर मुगल कभी इस्लाम के बताए रास्ते पर नहीं चले। इसलिए उनके लिए लड़ना ठीक नहीं। किसी को कुछ देकर ही उसका दिल जीता सकता है। डॉ. आजमी ने बताया कि मंच से जुड़े लोग घर-घर जाकर मुसलमानों से इस मुद्दे पर किसी के भड़काने में न आने और हिंदू भाइयों के साथ मिल-जुलकर रहने के लिए समझाएंगे। इस अभियान की शुरुआत रविवार से हो रही है।
फैसले का सम्मान करने की अपील
इस बीच, मंच के राष्ट्रीय प्रवक्ता यासर जीलानी ने मुसलमानों से अपील की है कि अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का जो भी फैसला आए उसका पूरा एहतराम करें। फैसला पक्ष में आए तो जश्न न मनाएं और यदि हिंदू भाइयों के पक्ष में आए तो एहतेजाज (विरोध प्रदर्शन) न करें।
नारेबाजी भी न करें और कोई ऐसी बात न बोलें जो किसी कौम, उसकी धार्मिक भावनाओं और उसके मजहबी जज्बातों को मजरूह (कष्ट पहुंचाने वाला) करने वाला हो। फैसला यदि पक्ष में आए तो मुसलमान भाइयों को चाहिए कि सौ करोड़ से ज्यादा हिंदू भाइयों की आस्था का केंद्र श्रीराम के मंदिर के लिए उस जमीन को उन्हें सौंपकर हिंदू भाइयों की आस्था का सम्मान करें।