ओपेन सर्जरी से रोबोटिक सर्जरी तक के सफरनामे से कैंसर के मरीजों की जान बचाना आसान हुआ है। अब गले की गांठ की जांच के लिए नई तकनीक अपनाई जा रही है। सेंटीनल एलएन बायोप्सी में गांठ के अंदर स्याही डाली जाती है। इससे जितना हिस्सा नीला पड़ जाता है, उसे निकाल दिया जाता है। बाकी हिस्से को छोड़ दिया जाता है। यह कहना है सर्बिया के बेल्ग्रेड से आईं डॉ. नाडा सेंनट्रस का। वह शनिवार को एसजीपीजीआई में इंटरनेशनल सोसायटी आफ आंकोप्लास्टिक इंडोक्राइन सर्जन्स एंव इंडियन सोसायटी ऑफ थायरॉइड सर्जन्स (आईएसटीएस) की ओर से आयोजित साइंटिफिक प्रोग्राम में सेंटीनल एनएल बायोस्पी पर व्याख्यान दे रही थीं। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्थानों से आए रोबोटिक सर्जन्स ने बताया कि जिन स्थानों पर सर्जरी के ज्यादा मरीज हों या विशेषज्ञों को सर्जरी करने में वक्त आड़े आ रहा हो, वहां रोबोटिक सर्जरी को वरीयता देनी चाहिए। विषेशज्ञों ने कहा कि 40 से अधिक सर्जरी करने वाले को ही विशेषज्ञ समझा जाना चाहिए।
कटी नस को जोड़ना अब मुमकिन
थायरॉइड सर्जरी के दौरान गले की नस के कटने से मरीज की आवाज जाने का खतरा रहा है। कटी नस को जोड़ना मुमकिन है। कुछ मरीजों की कटी हुईं नसें जोड़कर उनकी आवाज वापस लाने में सफलता हासिल हुई है। भविष्य में भारत में किसी आपरेशन के दौरान नस कटती है तो मरीज की आवाज वापस लाई जा सकेगी। अभी इस तकनीक का नामकरण नहीं किया गया है। यह जानकारी डॉ. अकीरा मियूची ने दी। वहीं सियोल के डॉ. जून यांग ने बताया कि रोबोटिक सर्जरी के दौरान कोई नस कट जाए तो उसे किस तरह से जोड़ा जा सकता है। इसी तरह डॉ. गौरव अग्रवाल, डॉ. मनीष कौशल ने थायरॉइड से होने वाली बीमारियों के बारे में जानकारी दी। मुंबई की डॉ. ज्योति डभोलकर ने थायरॉइड कैंसर में होने वाले मॉलीक्यूलर टेस्ट के बारे में बताया।