राजधानी में 12 मार्च को कोरोना का पहला मरीज मिलने पर चिकित्सक खाली हाथ थे। ऑक्सीजन से लेकर दवाओं तक की स्थिति स्पष्ट नहीं थी। इस बीच बीसीजी, आवरमेक्टिन, रेमडेसिविर जैसी दवाओं के बेहतर परिणाम मिले।
धीरे-धीरे इनकी खुराक तय कर दी गई। प्लाज्मा थेरेपी दी गई। पहले तय नहीं था कि थेरेपी कैसे और किन परिस्थितियों में देनी है। अब इसकी खुराक से लेकर देने के तरीके, मरीजों में प्रभाव से चिकित्सक वाकिफ हैं।
इसी तरह मरीजों को कब स्टेरॉयड देना है, यह भी तय नहीं था। मरीजों पर प्रयोग के बाद इसकी खुराक, देने के तरीके, मरीजों में बदलाव की जानकारी मिल गई है। फिर उसी हिसाब से दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है।
पहले वायरस की चपेट में आने वाले को तब तक अस्पताल में रोका जाता था, जब तक रिपोर्ट निगेटिव नहीं आती थी। अब सात दिन बाद बुखार नहीं आता है और 10वें दिन रिपोर्ट निगेटिव नहीं है तो भी डिस्चार्ज किया जा सकता है। यह भी पता चला कि गंभीर मरीजों में 12वें दिन दोबारा बुखार की संभावना रहती है।
मरीजों का स्वप्रबंधन भी बढ़ा
कोरोना के बाद मरीजों का स्व प्रबंधन बढ़ा है। लोग घर पर ऑक्सीजन जांचने लगे हैं। इम्यूनिटी को लेकर सतर्कता आई है। विभिन्न ट्रायल में आयुर्वेदिक औषधियों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं। लेकिन अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से परिणाम हानिकारक भी होने लगते हैं।
आम जनता में कम हुआ डर
वायरस को लेकर चिकित्सकों, कर्मियों और आम जनता में भय का माहौल कम होने लगा है। वहीं, अस्पतालों में बेड से लेकर आईसीयू और एचडीयू की व्यवस्थाएं सुधारी गई हैं। राजधानी में सरकारी क्षेत्र में लेवल-3 के तीन अस्पताल हो गए हैं।