चुनावी अभियान में प्रतीकों के सहारे सियासत को परवान चढ़ाने वाले नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद अब आरोपों की काट के लिए टोटकों के सहारे खुद को वैचारिक अधिष्ठान के प्रति प्रतिबद्ध जताना चाहते हैं।
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सरकार का एक साल पूरा होने की पूर्व संध्या पर मोदी का पं. दीनदयाल उपाध्याय के गांव जाने का कार्यक्रम इसी टोटके का हिस्सा लगता है। इसके पीछे मोदी और भगवा रणनीतिकारों की सोची-समझी रणनीति ही दिखाई दे रही है।
सभी जानते हैं कि भले ही जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रहे हों, पं. दीनदयाल उपाध्याय मंत्री व महामंत्री के रूप में ही जनसंघ में लंबे समय तक काम करते रहे हों।
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बावजूद इसके भाजपा की आज की पीढ़ी पार्टी के विकास में पंडित दीनदयाल उपाध्याय व अटल बिहारी वाजपेयी का ही मुख्य योगदान मानती है।
संयोग से इसी वर्ष सितंबर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म शताब्दी वर्ष भी शुरू हो रहा है। इसीलिए मोदी ने दीनदयाल धाम से अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ के समारोह शुरू करने का फैसला किया है।
यह हैं प्रमुख कारण
इस समय मोदी सरकार न सिर्फ विरोधियों, बल्कि अपने काडर के कार्यकर्ताओं के बीच भी तमाम सवालों के चक्रव्यूह में फंसी है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में किसानों, मजदूरों व गरीबों की अनदेखी से लेकर सरकार पर अभिजात्य वर्ग और पूंजीपतियों को संरक्षण देने तथा उनके हित में काम करने के आरोप भी लग रहे हैं।
लोगों की समझ में नहीं आ रहा कि दीनदयाल उपाध्याय की बनाई पार्टी उनकी अर्थनीति को अपनाने के बजाय एफडीआई का दायरा बढ़ाकर क्या साबित करना चाहती है।
पर, मुश्किल है टोटके की सफलता: लगता है दीनदयाल धाम की यात्रा के बहाने मोदी यह बताना चाहते हैं कि सामने कुछ भी दिख रहा हो लेकिन मूल में दीनदयालजी और जनसंघ की भावना व विचार पर ही काम हो रहा है। हालांकि मोदी कार्यकर्ताओं और आम लोगों को कितना संतुष्ट कर पाएंगे, यह तो भविष्य में पता चलेगा, पर भगवा परिवार के भीतर भी उनकी मथुरा यात्रा से बहुत भरोसा नहीं दिख रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठकों में भारतीय मजदूर संघ व किसान संघ मोदी सरकार की किसानों व मजदूरों को लेकर नीति पर पहले ही कई सवाल खड़े कर चुके हैं। स्वदेशी जागरण मंच की तरफ से भी सरकार की नीतियों को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं।
मूल सिद्घांतों से जरा भी नहीं भटकी है मोदी सरकार
हालांकि भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक दावा करते हैं कि मोदी सरकार मूल सिद्धांतों से जरा भी नहीं भटकी है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना, 12 रुपये में दुर्घटना बीमा और 330 रुपये में जीवन बीमा जैसी योजनाएं दीनदयालजी के रास्ते पर चलकर गरीबों के कल्याण का ही हिस्सा हैं। पर, पाठक के दावे पर मजदूर संघ से जुड़े एक कर्मचारी नेता की बात ही सवालिया निशान लगा देती है।
इनके मुताबिक, सरकार अपने आचरण से पूंजीपतियों के समर्थन और मजदूरों की अनदेखी को साबित कर रही है। अलबत्ता वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक समीक्षक राजनाथ सिंह सूर्य कहते हैं कि भाजपा की पहचान बने अंत्योदय और एकात्म मानववाद के सिद्धांत दीनदयालजी ने ही प्रतिपादित किए थे।
इसलिए प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का लोगों को यह बताना कि उनकी सरकार दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों पर ही चल रही है, हर तरीके से उचित ही है।
कांग्रेस के खिलाफ वर्ष 2013 में चुनावी अभियान शुरू करने से लेकर अब तक मोदी ने काशी को छोड़ भगवा परिवार के एजेंडे में शामिल अयोध्या व मथुरा से दूरी बनाकर रखी है।
अयोध्या में संतों के गृहमंत्री राजनाथ सिंह को सवालों में घेरकर केंद्र सरकार की नीति पर नाराजगी जताने के बाद मोदी का मथुरा जाना इस यात्रा को टोटका ही साबित करता है।
वे मथुरा जाकर हिंदुत्व के मुद्दे से सीधे तौर पर बचना भी चाहते हैं और यह बताना भी चाहते हैं कि भले ही मंदिर मुद्दे, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 पर चुप्पी साधे हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैचारिक अधिष्ठान के लक्ष्य उन्हें याद नहीं हैं।
पर, संघ परिवार द्वारा शुरू से अलगाववादी माने जाने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ समझौता करके जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने वाले मोदी की इस यात्रा से लोगों में भरोसा भर जाएगा, इसकी बहुत संभावनाएं नहीं दिखतीं।