डॉ. राममनोहर लोहिया।
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डॉ. राममनोहर लोहिया किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह खांटी समाजवादी थे, लेकिन उतने ही ईमानदार एवं अपने निर्णयों पर डटे रहने वाले। किस्सा 1963 का है। लोकसभा की चार सीटों-गुजरात की राजकोट, यूपी की फर्रुखाबाद, अमरोहा, जौनपुर का चुनाव हो रहा था। डॉ. लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का नारा देते हुए विपक्षी दलों से साझा उम्मीदवार लड़ाने का फैसला किया। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर जनसंघ सहित सभी दल इसमें शामिल थे।
प्रो. एपी तिवारी बताते हैं, फर्रुखाबाद से डॉ. लोहिया लड़ रहे थे। अमरोहा से जेबी कृपलानी, राजकोट से मीनू मसानी चुनाव लड़ रहे थे। तय हुआ था कि कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर पूरा विपक्ष इन सभी का पूरी एकजुटता से समर्थन एवं प्रचार करेगा। वोट दिलाने की कोशिश करेगा। जनसंघ के कार्यकर्ता फर्रुखाबाद में डॉ. लोहिया, अमरोहा में आचार्य कृपलानी और गुजरात में मीनू मसानी का समर्थन कर रहे थे। पर, जौनपुर में हालत अलग थी। डॉ. लोहिया पं. दीनदयाल जी के समर्थन में जौनपुर में सभा करने आए।
उन्होंने देखा कि जौनपुर में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सहित गैर जनसंघ घटकों के ज्यादातर नेता व कार्यकर्ता जनसंघ के साथ नहीं हैं। इससे डॉ. लोहिया काफी नाराज हुए। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए इसकी कड़ी आलोचना की।
उन्होंने कहा, जो लोग अपने कुतर्कों के आधार पर जनसंघ के पं. दीनदयाल उपाध्याय का विरोध कर रहे हैं वे गैर कांग्रेसवाद की नीति से धोखाधड़ी कर रहे हैं। खासतौर से समाजवादी कार्यकर्ताओं के रवैये से मुझे गहरा धक्का लगा है। अगर इस राजनीतिक धोखाधड़ी व बेईमानी को ही समाजवाद माना जा रहा है, तो देश में समाजवादी अपने दम पर कभी सत्ता में नहीं आ पाएंगे।