पं. कमलापति त्रिपाठी
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बात 1971 के लोकसभा चुनाव की है। पं. कमलापति त्रिपाठी चुनाव प्रचार के लिए मिर्जापुर के दौरे पर थे। उनकी सभा दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्र हलिया में थी। उन दिनों न सड़क ठीक थी और न अन्य सुविधाएं। मिर्जापुर के जिलाध्यक्ष ने मना किया कि गांव काफी दूर है। काफी देर हो जाएगी, इसलिए न जाएं।
पंडित जी बोले, ‘जो लोग वहां इंतजार कर रहे हैं, वे नाराज हो जाएंगे।’ पंडित जी के साथ उस यात्रा में शामिल वरिष्ठ पत्रकार कमल नयन ने एक बार इस किस्से को सुनाते हुए हमें बताया था-‘हलिया से मिर्जापुर लौटने में रात के नौ बज गए। मिर्जापुर के बाद राबर्ट्सगंज में सभा थी। जिलाध्यक्ष ने जाने में असमर्थता जताई। फिर पंडित जी बोले, चलना जरूरी है।’
एम्पाला गाड़ी से हम लोग कुछ ही दूर चले थे कि टायर फट गया। अंधेरी रात और सुनसान इलाका। चारों तरफ जंगल। स्टेपनी बदलकर गाड़ी कुछ दूर ही आगे बढ़ी थी कि पेट्रोल खत्म हो गया। पंडित जी ने कहा, जो भोलेनाथ करेंगे, वही होगा। वे गाड़ी में ही सो गए। हम लोग बाहर निकलकर मदद की आस में इधर-उधर देखने लगे। तभी एक ट्रैक्टर दिखा तो उसे रोका।
चालक को जब मालूम हुआ कि गाड़ी में पं. कमलापति जी हैं तो उसने ट्रैक्टर से कार को बांधा और बोला, हम आप लोगों को राजगढ़ बीज गोदाम तक छोड़ देते हैं। पंडित जी वहीं विश्राम कर लें। सुबह वैकल्पिक व्यवस्था हो जाएगी।’
ट्रैक्टर ने कार को खींचकर राजगढ़ बीज गोदाम पहुंचाया। वहां पंडित जी ने गोदाम के अध्यक्ष के कक्ष में पड़ी चौकी पर बिना कुछ खाए-पीए रात गुजारी। सुबह जब लोगों को पता चला तो दूसरी गाड़ी की व्यवस्था हुई। उसी से पंडित जी वाराणसी लौटे।