कभी-कभी संयोग व्यक्ति को कहां से कहां पहुंचा देता है। बात 1967 की है। विधानसभा चुनाव हो रहे थे। किस्सा लखनऊ की छावनी (कैंट) सीट का है। बद्री प्रसाद अवस्थी उन दिनों कांग्रेस के शहर के प्रमुख नेता हुआ करते थे। वे छावनी परिषद के उपाध्यक्ष भी थे। अवस्थी भी टिकट मांग रहे थे। पर, कांग्रेस ने किसी अन्य को उम्मीदवार बना दिया। इस पर उन्होंने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर जोर-शोर से प्रचार शुरू कर दिया। अवस्थी जी चूंकि उन दिनों नगर के प्रमुख वकीलों में थे, लिहाजा उनका चुनाव चर्चित हो गया।
स्व. बद्री प्रसाद अवस्थी के पुत्र संजय अवस्थी बताते हैं, तभी अचानक एक संयोग घटा। छावनी सीट से चुनाव लड़ रहे जनसंघ के उम्मीदवार झामन दास के खिलाफ किसी ने चुनाव आयोग से शिकायत कर दी कि वे सरकारी ठेकेदार हैं। उन पर सरकारी देनदारी के बकाया होने का भी आरोप लगा। जांच-पड़ताल के बाद दास का पर्चा खारिज कर दिया गया। जनसंघ के सामने मुश्किल खड़ी हो गई। नामांकन की तारीख तो बीत ही चुकी थी। संजय बताते हैं, एक दिन जनसंघ के तत्कालीन प्रमुख नेता रामप्रकाश गुप्त जो बाद में प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हुए, वे कचहरी पहुंचे। पर, पिता जी नहीं मिले।
गुप्ता जी ने पिता जी के मुंशी को अपने नाम की पर्ची दी और कहा, ‘बता देना कि मैं मिलना चाहता हूं।’ अगले दिन दोनों लोगों की मुलाकात हुई। गुप्ता जी के साथ जनसंघ के अन्य नेता भी थे। सभी ने पिता जी के सामने जनसंघ के समर्थन से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। परिवार एवं समर्थकों से विचार-विमर्श के बाद पिता जी राजी हो गए। पिता जी का चुनाव चिह्न था साइकिल।
साइकिलों पर दीपक रख उन्हें बांधा गया। पिताजी के समर्थक और जनसंघ के कार्यकर्ता इन्हीं साइकिलों से प्रचार करते। नारे लगते, ‘दीपक साइकिल के साथ, वोट अवस्थी के पास।’ पिता जी चुनाव जीत गए। जीतने के बाद वह जनसंघ में शामिल हो गए। फिर ताउम्र जनसंघ में ही रहे।