1980 के दशक में पूर्वांचल बाहुबलियों की गिरफ्त में आ चुका था। यही वह दौर था जब यहां की सियासी दुनिया में बाहुबलियों का प्रवेश हुआ। इसके सूत्रधार थे वीरेंद्र प्रताप शाही और पंडित हरिशंकर तिवारी। खास बात है कि दोनों में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर जमकर अदावत थी, तो दोनों एक ही विधानसभा क्षेत्र चिल्लूपार के रहने वाले थे।
तिवारी 1997 से लेकर 2007 तक लगातार यूपी में मंत्री रहे। इन दोनों की राजनीति में प्रवेश सफल रहने के बाद तो पूर्वांचल की सियासत में आपराधिक छवि वालों का दखल तेजी से बढ़ने लगा। मऊ से मुख्तार अंसारी, वाराणसी से बृजेश सिंह, आजमगढ़ से रमाकांत यादव और उमाकांत यादव ने भी सियासत की दुनिया में प्रवेश पा लिया। अपने रसूख और दमखम के बल पर इन सभी ने अपने क्षेत्र में दबदबा बनाया।
श्रीप्रकाश भी आना चाहता था राजनीति में
कुख्यात माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला भी राजनीति में आना चाहता था। पर, सियासत की दुनिया में वह दाखिल हो पाता इससे पहले ही यूपी एसटीएफ ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया। दरअसल, श्रीप्रकाश ने 1996 में लखनऊ में शाही की हत्या कर दी तो इसके बाद आशंका जताई गई थी कि हरिशंकर तिवारी की भी हत्या कर देगा। उस वक्त चर्चा चली थी कि श्रीप्रकाश खुद चिल्लूपार विधानसभा सीट पर कब्जा जमाना चाहता था।