गोरक्षपीठ न केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है, बल्कि आजादी की लड़ाई और सामाजिक आंदोलनों को भी इस पीठ ने धार दी। राममंदिर आंदोलन का जिक्र तो बिना गोरक्षपीठ की चर्चा किए पूरी ही नहीं हो सकती। वहीं सियासी दुनिया की बात करें तो महंत दिग्विजय नाथ से शुरू हुआ सफर, महंत अवेद्यनाथ से होते हुए योगी आदित्यनाथ तक जारी है। यह सफर उस मुकाम तक आ पहुंचा कि प्रदेश की राजनीति गोरक्षपीठ के इर्द-गिर्द घूमने लगी।
उन्होंने संतों के साथ भक्तों का आह्वान किया। बताया जाता है कि थोड़ी देर में ही राम जन्भूमि पर पांच हजार से अधिक साधु-संत और भक्त एकत्रित हो गए थे। जन्मभूमि पर भजन-कीर्तन शुरू हो गया। इतना ही नहीं उनके अनुरोध पर वहां भक्तों के आने का सिलसिला भी शुरू हो गया। माहौल ऐसा बना कि सरकार को मूर्ति हटाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। महंत दिग्विजयनाथ जब तक जिंदा रहे, मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। उनके निधन के बाद 1984 में विश्व हिंदू परिषद के बैनर तले राम जन्मभूमि का आंदोलन शुरू हुआ। महंत अवेद्यनाथ को राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया गया। महंत अवेद्यनाथ इसके आजीवन अध्यक्ष रहे। जब विवादित ढांचा ढहाया गया तो उसके गवाह भी वे बने। विवादित ढांचा ढहाए जाने पर उन्होंने कहा था-जनभावनाओं का जब आदर नहीं होगा, जनाक्रोश इसी तरह से कलंक की निशानी को मिटा देगा। आज अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। इसकी अगुवाई योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।
संतों के कहने पर दोबारा सक्रिय हुए
रामजन्म भूमि आंदोलन के बीच 1989 का लोकसभा चुनाव होने जा रहा था। राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े संतों ने महंत अवेद्यनाथ से कहा था कि संसद में हमारा कोई प्रतिनिधि होना चाहिए। जो हमारी बात पूरी दमदारी से रख सके। संतों के आग्रह पर वह फिर राजनीति में सक्रिय हो गए। अवेद्यनाथ हिंदू महासभा से गोरखपुर संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतर गए। जनता दल की उस समय चल रही लहर भी महंत अवेद्यनाथ के संसद पहुंचने का रास्ता नहीं रोक सकी। वे चार बार सांसद चुने गए।
योगी सबसे कम उम्र के बने सांसद
1998 में महंत अवेद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ को लोकसभा चुनाव लड़ने का आदेश दे दिया। गुरु का आदेश मिलने के बाद आदित्यनाथ चुनाव मैदान में उतर गए। वह चुनाव जीते और उस समय के सबसे कम उम्र के सांसद बन गए। 1998 से 2014 तक वह लगातार पांच बार सांसद चुने गए।