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यहां लड़कियों की तरफ देखना भी गुनाह

Thu, 12 Sep 2013 01:06 PM IST
आशीष त्रिपाठी/लखनऊ
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सर! यहां सीनियर्स बहुत मारते हैं। हॉस्टल से निकलने में भी डर लगता है।
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न जाने कब कोई आकर परेशान करने लगे। क्लास की लड़की से बात तो दूर की बात है, हम उनकी ओर देख भी नहीं सकते।

इससे तंग होकर कई बच्चे चले गए हैं...घर की स्थिति ठीक नहीं है। पिता जी ने काफी उम्मीदों से भेजा है। वापस भी नहीं जा सकते... इसलिए झेल रहे हैं।

ये दर्द है राजधानी के मोहान रोड स्थित जीवी पंत पॉलीटेक्निक के जूनियर छात्रों का। खौफ का आलम ये है कि वे हॉस्टल से बाहर निकलने में भी घबराते हैं।

यहां इस वर्ष करीब 120 छात्रों ने एडमिशन लिया है। समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित इस एक मात्र पॉलीटेक्निक संस्थान में 70 प्रतिशत सीटें एससी-एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं।

अन्य 15 प्रतिशत पर ओबीसी और 15 पर सामान्य वर्ग के दाखिले होते हैं। एससी-एसटी वर्ग के छात्रों के लिए हॉस्टल की भी व्यवस्था है। अंबेडकर हॉस्टल में फर्स्ट ईयर और सिद्धार्थ में सेकंड व थर्ड ईयर के छात्र रहते हैं।
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एक ही परिसर में हॉस्टल होने के कारण जूनियर्स रैगिंग की मार झेलने के लिए मजबूर हैं। एक छात्र की मानें तो हॉस्टल से बाहर निकलने से पहले सीनियर्स से परमिशन लेनी पड़ती है।

सीनियर्स के डर का आलम यह है कि हॉस्टल में फर्स्ट ईयर के 120 छात्रों के रहने की व्यवस्था के बावजूद मात्र 40-50 छात्र ही पढ़ने आते हैं।

इधर, रैगिंग की तमाम खबरों के बीच कॉलेज प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है। आलम ये है कि मुख्य गेट से लेकर हॉस्टल तक कहीं भी एंटी रैगिंग सेल का बोर्ड और हेल्पलाइन नंबर नहीं दिखाई दिए।
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कॉलेज प्रशासन का दावा है कि एंटी रैगिंग कमेटी बनी हुई है लेकिन उसमें कौन सदस्य हैं और उनके मोबाइल नंबर क्या हैं, यह हॉस्टल में कहीं भी नहीं दर्ज हैं।

एंटी रैगिंग समिति काम कर रही है। हॉस्टल में अभी तक एंटी रैगिंग समिति के सदस्यों के नंबर और अन्य सूचनाएं अंकित नहीं हो पाई हैं। जल्द ही इसे भी करवा दिया जाएगा। अभी तक रैगिंग का कोई भी मामला सामने नहीं आया है।-केके श्रीवास्तव, प्रिंसिपल, जीवी पंत पॉलीटेक्निक
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