साहित्यकार प्रोफेसर नेत्रपाल सिंह
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चर्चित उपन्यास बहादुर बंदा बैरागी, चारुमती, भगवान झूलेलाल उपन्यास के रचयिता प्रो. नेत्रपाल सिंह नहीं रहे। 79 वर्षीय प्रो. नेत्रपाल लंबे समय से लिवर की बीमारी से जूझ रहे थे। शनिवार सुबह बलरामपुर चिकित्सालय में उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि मौत के बाद उनकी देह दान कर दी जाए। शाम को परिवारीजनों ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए राजाजीपुरम आवास पर पहुंची केजीएमयू की टीम को पार्थिव देह सौंपी। साहित्य से समाज का मार्गदर्शन करने वाले प्रो. नेत्रपाल की पार्थिव देह चिकित्सा छात्रों के अध्ययन के काम में आएगी।
अक्तूबर 1940 में जन्मे प्रो. नेत्रपाल 1999 में राजकीय गोविंद वल्लभ पंत पॉलिटेक्निक लखनऊ से अंग्रेजी प्रवक्ता पद से रिटायर हुए थे। वे अपने पीछे पत्नी, दो पुत्र और दो पुत्रियां छोड़ गए हैं। उनके बड़े पुत्र डॉ. कौशलेंद्र सिंह अमेरिका में वैज्ञानिक हैं। साहित्यकार अवधेश गुप्त ‘नमन’ ने बताया कि वे निराला साहित्य परिषद महमूदाबाद सीतापुर और अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद लखनऊ के संरक्षक थे। इसके अलावा वे निखिल हिंदी परिषद लखनऊ के अध्यक्ष भी रहे। प्रो. नेत्रपाल के निधन की सूचना सुनते ही उनके घर पर जनप्रतिनिधियों और साहित्यसेवियों का जुटना शुरू हो गया। विधायक पंकज सिंह, विधायक सुरेश श्रीवास्तव, महापौर संयुक्ता भाटिया, मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह, अनुराग मिश्रा अन्नू समेत शहर के कई पार्षद उनके घर पहुंचे।
पिताजी कहते थे-मरने के बाद भी देह किसी के काम आए
प्रो. नेत्रपाल के छोटे पुत्र ब्रजेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पिताजी दो साल पहले केजीएमयू एनॉटमी विभाग को अपनी देहदान कर चुके थे। वे अक्सर कहा करते थे, काम ऐसे करने चाहिए, जिससे दुनिया से जाने के बाद भी ये देह किसी न किसी के जरूर काम आए।