केंद्र सरकार बिजली वितरण के साथ अब ट्र्रांसमिशन नेटवर्क भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है। बिजली के निजीकरण के लिए प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक-2021 के संसद से पारित न हो पाने पर केंद्र सरकार ने अपनी मंशा को अमलीजामा पहनाने के लिए यह नया रास्ता तलाशा है।
केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के संयुक्त सचिव (ट्रांसमिशन) मृत्युंजय कुमार नारायण ने यूपी समेत सभी राज्यों के मुख्य सचिवों व ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिवों को पत्र भेजकर बिजली वितरण के लिए इस्तेमाल होने वाले 33 केवी नेटवर्क को राज्य ट्रांसमिशन उपयोगिता (एसटीयू) में शामिल करने को कहा है। दरअसल, मौजूदा समय में 132 केवी और उससे ऊपर का नेटवर्क ही ट्रांसमिशन में आता है जबकि 33 केवी और उससे नीचे का नेटवर्क पावर कॉर्पोरेशन के अधीन है, जिससे बिजली वितरण किया जाता है।
केंद्र ने एसटीयू को पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (पीजीसीआईएल) के साथ संयुक्त उपक्रम बनाने को भी कहा गया है। इसके बाद एक तरह से बिजली के पूरे वितरण व ट्रांसमिशन नेटवर्क पर भारत सरकार का नियंत्रण हो जाएगा और निजीकरण की राह में आने वाली बाधाएं दूर हो जाएंगी।
वितरण के लिए नहीं रह जाएगी लाइसेंस की जरूरत
जानकारों का कहना है कि 33 केवी नेटवर्क के ट्रांसमिशन यूटिलिटी में शामिल हो जाने के बाद वितरण नेटवर्क नहीं रह जाएगा। ऐसे में सरकार विद्युत (संशोधन) विधेयक-2021 के अटकने की वजह से निजीकरण की अपनी जिस मुहिम को पूरा नहीं कर पा रही है, उसे अंजाम देने में सफल हो सकती है। प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक में यह स्पष्ट प्रावधान है कि बिजली वितरण के लिए कंपनियों को लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी। एक क्षेत्र में चाहे जितनी कंपनियां वितरण कर सकती हैं। इन्हें सिर्फ नियामक आयोग में पंजीकरण भर कराना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि जो भी कंपनियां वितरण क्षेत्र में आएंगी, वे पहले से मौजूद नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकेंगी। इसके लिए उन्हें केवल यूजर चार्ज देना होगा।
निजी क्षेत्र के मुनाफे का जरिया बनेगा
बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञों की मानें तो आजादी के बाद से अब तक लाखों करोड़ रुपये खर्च करके बिजली का जो नेटवर्क तैयार किया गया है, वह अब निजी क्षेत्र के मुनाफा कमाने का जरिया बनने जा रहा है। चूंकि पीजीसीआईएल राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन में शामिल है, इसलिए देर-सवेर पूरा नेटवर्क निजी हाथों में जा सकता है।
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने किया विरोध
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे का कहना है कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से राज्यों की बिजली व्यवस्था पर केंद्र का नियंत्रण हो जाएगा और वह जैसे चाहेगी वैसे इस सेक्टर को चलाएगी। उन्होंने कहा कि 33 केवी नेटवर्क को ट्रांसमिशन यूटिलिटी में शामिल करने का प्रावधान न तो राष्ट्रीय विद्युत नीति और न ही विद्युत (संशोधन) विधेयक 2021 के मसौदे में है। यही नहीं मौजूदा समय में प्रभावी विद्युत अधिनियम 2003 में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। दुबे ने कहा कि भारत सरकार के इस कदम का हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।