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सीने से लगा कर हर साल बचाई जा सकती है 50 हजार शिशुओं की जान

Wed, 07 Jun 2017 01:37 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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कमजोर श‌िशु को बचाने के उपाय बताती सलाहकार - फोटो : amar ujala
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यूपी में हर वर्ष दो लाख नवजात शिशु समय से पहले जन्म और कम वजन जैसी समस्याओं की वजह से मर जाते हैं। ये एक वर्ष की उम्र भी पूरी नहीं कर पाते। कम संसाधनों के कारण सभी को इंक्यूबेटर की सहूलियत दे पाना संभव नहीं है।
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ऐसे में नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) और कम्युनिटी एम्पावरमेंट लैब (सीईएल) मिलकर कंगारू मदर केयर (केएमसी) तकनीक से इन मौतों में कमी लाने का प्रयास करेंगे। एनएचएम का दावा है कि केएमसी तकनीक से 50 हजार शिशुआें की जान बचाई जा सकती है।  

मातृ एवं शिशु कल्याण मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने मंगलवार को लखनऊ में इस प्रोजेक्ट को 25 जिलाें के जिला एवं महिला चिकित्सालयों के लिए लॉन्च किया गया।
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जोशी ने इस बात पर दुख जताया कि प्रदेश में शिशु मृत्यु दर अधिक है, वह भी तब जबकि सरकार हालात में सुधार के लिए भरपूर बजट दे रही है। कहा कि हर सांसद और विधायक को इस नए प्रोजेक्ट को सफल बनाने में मदद करनी होगी ताकि सूरत बदली जा सके।


 

हजार में 31 शिशु एक साल भी पूरा नहीं कर पाते

कंगारू मदर केयर में कार्यरत लोगों को सम्मान‌ित करती मंत्री रीता बहुगुणा जोशी - फोटो : amar ujala
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को छोटे अस्पतालों को भी अपनी निगरानी में रखना होगा। कम्युनिटी एम्पावरमेंट लैब के सीईओ विश्वजीत ने बताया कि प्रदेश के कई दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों में कमजोर नवजात बच्चों को इंक्यूबेटर की सुविधा नहीं मिल पाती।

​यह भी मृत्यु दर अधिक होने की वजह है। उन्हाेंने दावा किया कि केएमसी तकनीक अपनाई जाए तो इंक्यूबेटर के मुकाबले 40 प्रतिशत अधिक जानें बचाई जा सकेंगी। एनएचएम के डायरेक्टर (यूपी) आलोक कुमार ने बताया कि केएमसी सेंटर की सुविधा अभी आठ जिलों के चुने हुए अस्पतालों में दी जा रही थी।

इसे बढ़ाकर 25 किया गया है। वर्ष के अंत तक सभी जिलों के पुरुष व महिला अस्पतालों में ये सेंटर खुल जाएंगे। प्रदेश में जन्मे 1000 में से 31 शिशु विभिन्न वजहाें से एक वर्ष भी पूरा नहीं कर पाते। 

सीईएल की सह संस्थापक आरती कुमार ने रायबरेली की साक्षी का उदाहरण द‌िया जो  जो 2004 में जब जन्मी तो उसका वजन केवल 800 ग्राम था। घर में केएमसी तकनीक से चार-पांच महीने तक बच्ची की देखभाल की गई। इसका चमत्कार था कि आज साक्षी पूरी तरह स्वस्थ है।
 
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पढ़ें, क्या है तकनीक

कंगारू मदद केयर के बारे में जानकारी देती सलाहकार - फोटो : amar ujala
यह तकनीक कठिन नहीं है। नवजात को जब तक संभव हो, सीने से लगाए रखने की जरूरत होती है। बहुत कुछ वैसे ही जैसे कंगारू अपने नवजात को पेट की थैली में संभाल कर रखते हैं। मां को दिन भर में 18 घंटे तक बच्चे को सीने से चिपकाए रखना होता है।

यह प्रक्रिया शिशु के जन्म के चार से छह महीने तक जारी रखनी होती है। शिशु बड़ा होने पर खुद अलग होने की कोशिश करता है। यह संकेत है कि अब प्रक्रिया जारी रखने की जरूरत नहीं। आरती बताती हैं कि इसके  लिए विशेष रूप से बने गाउन माताओं को दिए जा रहे हैं। 

ये हैं केएमसी तकनीक के फायदे
- कम वजन या समय से पहले जन्मा शिशु हाइपोथर्मिया का शिकार हो सकता है। मां के सीने से मिली गर्माहट उसे इससे बचाती है।
- शिशु के जन्म के पहले घंटे में 22 प्रतिशत माताएं उसे स्तनपान आज भी नहीं करवा रही हैं। इस तकनीक में यह भी करवाया जाता है।
- मां की त्वचा से मिले संपर्क से बच्चे को सुरक्षा का अहसास मिलता है। इससे रोगों व कमजोरियों से लड़ने की उसकी क्षमता बढ़ती है।
- केएमसी पा रहे शिशु में किसी और बीमारी की चपेट में आने की संभावना अन्य शिशु के मुकाबले 70 प्रतिशत कम हो जाती है।
 
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