इस मौके पर कलश यात्रा भी निकाली गई।
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आचार्य सुनील लक्ष्मीकांत दीक्षित ने बताया कि कलश यात्रा से पहले की जो पूजा होती है उसे कलश पूजन कहते हैं। सरयू तट पर नौ वर्धिनी यानि नौ कलशों में सरयू जल भरकर पूजन किया गया। एक मुख्य कलश का भी पूजन हुआ, जिसकी पूजन विधि यजमान के जरिये संपन्न कराई गई। वहीं नौ कलशों के पूजन में नौ मातृ शक्तियां भी शामिल रहीं, सभी ने कलश पूजन किया। पूजन के दौरान सरयू समेत देश की सभी पवित्र नदियों व सागरों का आह्वान किया गया। इसके बाद मां सरयू का पंचामृत अभिषेक कर सरयू जल कलश में भरा गया। इसके बाद पूजित कलशों को मातृ शक्तियों ने अपने सिर पर रखकर कलश यात्रा निकाली जो राम जन्मभूमि पथ तक गई, यहां से कलश को पूजन स्थल पर लाया गया। पवित्र जल से गर्भगृह स्थल व पूजन स्थल का शुद्धीकरण किया गया।
यज्ञमंडप में स्थापित किए गए कलश
अगले चरण में यज्ञमंडप में ओम भूर्भुवः स्वः भो वरुण, इहागच्छ, इह तिष्ठ, स्थापयामि, पूजयामि, मम पूजां गृहाण...आदि मंत्रोच्चारों के साथ कलश की स्थापना कराई गई। नौ वेदियों पर अन्य नौ कलश स्थापित किए गए। पूजन में आचार्य मृत्युंजय प्रसाद त्रिपाठी, आचार्य शिवेश शर्मा, आचार्य अंकित अवस्थी, आचार्य कमलेश झा, आचार्य विजेंद्र त्रिवेदी, आचार्य अविनाश धर द्विवेदी शामिल रहे।