मुजफ्फरनगर और शामली से शुरू हुआ सांप्रदायिक हिंसा का सिलसिला मेरठ और कांठ होते हुए संभल तक पहुंच गया। लगता है कि गंगा-जमुनी संस्कृति और उर्वरा भूमि वाले वेस्ट यूपी को सियासत लगातार सुलगाए रखना चाहती है।
मामूली बातों पर विवादों को इतना तूल दिया जा रहा है कि जनता के असली मुद्दे हवा हो गए हैं। माना जा रहा है कि तात्कालिक तौर पर भले ही उपचुनाव लक्ष्य दिखता हो लेकिन राजनीतिक दलों की नजर 2017 के विधानसभा चुनाव पर है।
किसान आंदोलन, सामाजिक भाईचारे, समृद्धि और खेतों की हरियाली के लिए चर्चा में रहने वाले वेस्ट यूपी को दंगों का बदनुमा दाग लग रहा है।
अंदर ही अंदर सुलग रही आग
मुजफ्फरनगर और शामली में दंगों को अभी साल भी नहीं बीता कि यही सिलसिला आसपास के जिलों में पहुंच गया है। कभी मेरठ में माहौल को गरमाया जाता है तो कभी संभल में कोशिश होती है।
कांठ में तनाव भले ही टल गया लगता हो लेकिन अंदर आग अब भी सुलग रही है। ताजा मामला वेस्ट यूपी के प्रमुख बिजनेस सेंटर सहारनपुर में हिंसा का सामने आ गया है।
माना जा रहा है कि विवाद की असली वजह राजनीति से जुड़ी हुई है। वेस्ट यूपी में लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण इस कदर हुआ कि चुनावी नतीजे इकतरफा रहे। राजनीतिक दल अगले विधानसभा में इसी फॉर्मूले को दोहराना चाहते हैं।
सांप्रदायिक तनाव के पीछे सियासी कारण
दरअसल, राजनीतिक पार्टियों के पास व्यापक जनाधार को जोड़ने वाले कार्यक्रम और नीतियां नहीं हैं। बार काउंसिल ऑफ यूपी के पूर्व चेयरमैन और बिजनौर के वरिष्ठ अधिवक्ता बलवंत सिंह कहते हैं कि वेस्ट यूपी में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने के पीछे सिर्फ सियासी कारण हैं।
भाजपा उसी एजेंडे पर चल रही है जिस पर उसे पश्चिमी यूपी में लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित कामयाबी मिली है।
केंद्र में सरकार बनाने के बाद मौजूदा आर्थिक नीतियों के चलते भाजपा आम लोगों की उम्मीदों के बोझ को ढो पाएगी, इसमें संदेह है।
सांप्रदायिकता कारगर हथियार
वरिष्ठ अधिवक्ता बलवंत सिंह का कहना है कि ऐसे में सांप्रदायिक एजेंडा ही उसे कारगर हथियार लगता है।
हजारों बदहाल मंदिरों पर किसी का ध्यान नहीं है, लेकिन कांठ में एक मंदिर में लाउडस्पीकर के लिए इसलिए आंदोलन किया जाता है कि उसकी आड़ में मिलने वाले दलित वोट चुनावी लाभ दिला सकते हैं।
भाजपा के एजेंडे में योगदान सपा भी कर रही है। भाजपा हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण चाहती है तो मुस्लिमों की बात करना सपा की राजनीतिक मजबूरी है। सारा खेल वोटों के गणित का है।
उपचुनाव वाले जिलों में हो हाईअलर्ट
विधान परिषद में कांग्रेस विधायक दल के नेता नसीब पठान खां कहते हैं कि मुजफ्फरनगर में जाट-मुसलमानों, मुरादाबाद (कांठ) में दलित-मुसलमानों और सहारनपुर में सिख-मुसलमानों को लड़ाने की कोशिशों से साफ है कि समाज को बांटने की साजिश चल रही है।
नसीब पठान कहते हैं कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए सपा ने पहले माहौल को सांप्रदायिक बनाने में योगदान दिया लेकिन बाद में गेंद उसके पाले से निकल गई। इस माहौल का पूरा लाभ भाजपा ने उठाया।
पश्चिमी यूपी में जहां भी सांप्रदायिक दंगे या तनाव हो रहे हैं, उसके पीछे सियासत ही मुख्य वजह है। प्रदेश सरकार को उन सभी जिलों में अलर्ट कर देना चाहिए जहां उपचुनाव होने हैं।
60 दिन में भाजपा सरकार कुछ कर नहीं पाई है। इसलिए सांप्रदायिक एजेंडे पर चल रही है। अब जनता सब समझ रही है। उत्तराखंड में विधानसभा उपचुनावों से यह साबित भी हो गया।
भाजपा-सपा की नूराकुश्ती
विधान परिषद में रालोद विधायक दल के नेता चौधरी मुश्ताक का भी मानना है कि पश्चिमी यूपी के दंगे राजनीतिक हैं। भाजपा और सपा मुसलमानों को मोहरा बनाकर राजनीति कर रही हैं।
उनकी योजना राजनीति को सपा बनाम भाजपा बनाने की है। चौधरी मुश्ताक के मुताबिक पश्चिमी यूपी में योजनाबद्ध तरीके से माहौल बिगाड़ने की कोशिशें हुईं।
मुजफ्फरनगर में जाट-मुसलमानों को बांटा गया। कांठ में दलित-मुसलमानों को लड़ाने की कोशिशें हुईं। वक्त रहते दलित लीडरशिप सक्रिय हो गई, वरना दंगा हो गया होता।
मुसलमानों को भी स्थिति को समझना होगा। उन्हें आपसी भाईचारे और शिक्षा पर ध्यान देना होगा।
सरकार के पक्षपात के कारण हो रहा विरोध
पश्चिमी यूपी की खास समझे वाले समाजशास्त्री डॉ. जेके पुंडीर का कहना है कि यदि राजनीति न हो तो पश्चिमी यूपी में कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं होगा।
इस क्षेत्र में सामाजिक भाईचारे का पुराना इतिहास है लेकिन शासक वर्ग ने एक वर्ग की भावनाएं इतनी बढ़ा दीं कि दूसरे वर्ग में ईर्ष्या जैसा भाव आ गया।
इसी कारण मामूली विवाद भी सांप्रदायिक चिंगारी का रूप ले रहे हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व वीसी और समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो. पुंडीर कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है।
यूपी सरकार ने दिखाई कम्युनल टॉलरेंस
प्रो. पुंडीर के अनुसार शासक वर्ग को निष्पक्ष भूमिका निभानी होगी। राजशाही तो है नहीं कि राजा जो कहे, प्रजा को मानना ही होगा।
अब लोकतंत्र है। शासक वर्ग पक्षपात करेगा तो लोग विरोध में उठ खड़े होंगे। मौजूदा सरकार ने अपने कार्यकाल में कम्युनल टॉलरेंस दिखाई है।
संदेश ऐसा गया कि सत्ता का पलड़ा एक तरफ झुक रहा है। इसी से दिक्कतें बढ़ी हैं। सहारनपुर का दंगा भी कुछ हद तक इसी का नतीजा है।