लोकसभा चुनाव के ठीक पहले हो रहा निकाय चुनाव भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा जैसे प्रमुख दलों का कद भी तय करेगा। इसलिए सभी दल इस बार महापौर और अध्यक्षों की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर परचम फहराकर लोकसभा चुनाव में अपने जनाधार का पैमाना पेश करना चाहते हैं। भाजपा की कोशिश है कि 2017 के मुकाबले इस बार महापौर की सभी सीटों के साथ अध्यक्ष की अधिकतर सीटों पर कब्जा किया जाए, वहीं सपा भी अधिक सीटें जीतकर अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का संदेश देना चाहती है।
लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 80 सीटों को जीतने का दावा करने वाली भाजपा ने यूं तो बहुत पहले से ही निकाय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। 127 नए निकायों का गठन और 111 निकायों का सीमा विस्तार कर सरकार ने शहरों के साथ ही गांवों में भी जनाधार को मजबूत करने की कोशिश की है। इसीलिए महापौर और अध्यक्ष से लेकर पार्षद उम्मीदवार तक के चयन को लेकर भाजपा बेहद सतर्क है।
सपा भी महापौर की सीटों पर खाता खोलने और अध्यक्ष की सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए गंभीरता से जुटी है। यही वजह है कि पार्टी ने इस बार महापौर की उन सीटों पर खास फोकस किया है, जिन पर वह पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी। ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए सपा ने अपने मौजूदा और पूर्व विधायकों के परिजनों को जहां टिकट दिया है, वहीं कई निवर्तमान अध्यक्षों का टिकट भी काटा है।
कई वरिष्ठ विधायकों को भी चुनावी तैयारी में लगाया गया है। बता दें, इस बार कुल 17 नगर निगम, 199 नगर पालिका परिषद और 544 नगर पंचायतों के लिए चुनाव हो रहे हैं। वहीं, बसपा भी महापौर की सीट पर बेहतर प्रदर्शन करने को लेकर तैयारी में जुटी है।
2017 के चुनाव में इस तरह दलों को मिली थी सीट
पार्टी -- नगर निगम -- नगर पालिका -- नगर पंचायत
भाजपा -- 14 -- 70 -- 100
बसपा -- 2 -- 29 -- 45
सपा -- 4 -- 5 -- 83
कांग्रेस -- 00 -- 09 -- 17