इनमें से ( कोमल वीर मस्ताना फुंकले चौरी-चौरा थाना) तो किसी जमाने में बेहद लोकप्रिय था। इसके अलावा भी कोमल को लेकर एक लोकगीत (सहुआकोल में कोमल तपले, फूँकले चौरा थाना, ठीक दुपहरिया चौरा जर गइल, कोई मरम नहीं जाना) और वीर रस की एक कविता (भडके अहीर गांव के सारे, दई थाने में आग लगाय। काट गिराया थानेदार को,गई खबर हिंद में छाय....। खबर सुनी जब गांधी जी ने,दहशत गई बदन में छाय। फैली अशांति कुछ भारत में, आंदोलन को दिया थमाय,सोचा कुछ हो शायद उनसे गलती गए यहां पर खाय। मौका मिली फेरि गोरों को दीनी यहां फूट कराय।मची फूट फेरि भारत में,रक्षा करें भगवती माय। खूब लडाया हम दोनों को ,मतलब अपना लिया बनाय। बने खूब हम पागल कैसे, जरा सोचना दिल में भाय) भी कभी-कभी सुनने को मिलती है।
क्रांतिकारी आंदाेलन के विस्तार में चौरी-चौरा की बड़ी भूमिका
दरअसल 13 अप्रैल 1919 को हुआ जलियावाला बाग कांड और चौरी-चौरा की इस घटना के बाद से ही जंगे आजादी में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, आशफाक उल्लाह जैसे क्रातिकारी सोच के लोग हारावल दस्ते के रूप में उभरे। इन सबका मानना था कि आजादी सिर्फ अहिंसा से मिलने से रही। उस दौरान गोरखपुर ऐसे क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया था। काकोरी कांड के आरोप में रामप्रसाद बिस्मिल ने वहीं के जेल में सजा काटी। वहीं 10 दिसंबर 1927 को उन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा था। शचींद्र नाथ सान्याल, प्रो.सिब्बन लाल सक्सेना, विश्वनाथ मुखर्जी, शिवरतन लाल, जामिन अली आदि का शुमार ऐसे ही लोगों में होता है।
यहां शचिन्द्र सान्याल का जिक्र थोड़ा प्रासंगिक होगा। शचिंद्र चार भाइयों में सबसे बड़े थे। सारे के सारे भाई आजादी के प्रति इतने दीवाने हों यह खुद में अपवाद है। रवीद्रनाथ सान्याल को बनारस षड्यंत्र में शामिल थे। जीतेंद्रनाथ सान्याल को बनारस ओर लाहौर के षडयंत्र के आरोप में सजा मिली थी। भूपेंद्र नाथ सान्याल काकोरी कांड के आरोपी थे। शचीन्द्रनाथ सान्याल को अन्य सजाओं के साथ दो बार काला पानी की सजा हुई। अपने 52 साल के जीवन के 25 साल उन्होंने जेल में ही गुजारे। अंतिम सांस भी उन्होंने गोरखपुर के दाउदपुर मोहल्ले में ली।