22 साल में मिला दूसरा गैलेंट्री अवॉर्ड मिला है। आधी आबादी को शौर्य दिखाना अभी बाकी है। 2002 में तिलोत्तमा वर्मा को पहला तो 2024 में मंजिल सैनी को दूसरा गैलेंट्री अवॉर्ड मिला। ऑपरेशन में महिलाओं का शामिल नहीं होना सबसे बड़ी वजह बन रहा है
पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के तमाम प्रयास हो रहे हैं, लेकिन पुलिस के लिए सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रपति का वीरता पदक महिला कर्मियों के हिस्से नहीं आ पा रहा है। यूपी पुलिस के इतिहास में अब तक सिर्फ दो महिला आईपीएस अधिकारियों तिलोत्तमा वर्मा और मंजिल सैनी को ही राष्ट्रपति का वीरता पदक मिला है।
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करीब 75 वर्ष पुराने यूपी पुलिस के इतिहास में केवल दो महिलाओं को ही वीरता पदक मिलना तमाम सवाल खड़े करता है, हालांकि ये बाकी महिला पुलिसकर्मियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं। वर्ष 2002 में एसपी हाथरस तिलोत्तमा वर्मा को बैंक लुटेरों के साथ हुई साहसिक मुठभेड़ की वजह से राष्ट्रपति का वीरता पदक दिया गया था। यह पदक पहली बार यूपी पुलिस में किसी महिला अफसर को मिला था।
जनवरी 2024 में तिलोत्तमा वर्मा के बाद आईपीएस मंजिल सैनी को राष्ट्रपति का वीरता पदक मिला। उन्हें यह पदक मेरठ में एसएसपी रहने के दौरान दिल्ली से अपहृत डॉक्टर को सकुशल बरामद करने के लिए दिया गया था। इस मुठभेड़ में तत्कालीन एडीजी जोन मेरठ प्रशांत कुमार भी शामिल थे।
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उन्हें भी राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा तमाम महिला पुलिस अधिकारियों को राष्ट्रपति का पुलिस पदक तो मिला, लेकिन वीरता पुरस्कार के मानकों पर वे खरी नहीं उतरीं। हालांकि नोएडा की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और विजिलेंस में एएसपी इंदु सिद्धार्थ को मुख्यमंत्री का उत्कृष्ट सेवा पदक मिल चुका है।
नहीं सौंपी जाती जघन्य अपराधों की विवेचना
महिला पुलिसकर्मियों की ऑपरेशन में भूमिका नहीं होना इसकी सबसे बड़ी वजह है। महिलाओं का संवेदनशील होना और मुठभेड़ के दौरान उनके चोटिल होने की संभावना को भी ध्यान में रखकर उन्हें शामिल नहीं किया जाता है।
आमतौर पर किसी बड़ी वारदात के बाद पुरुष पुलिसकर्मियों की टीम ही खुलासे में जुटती है। थानों में तैनात महिला निरीक्षक, उपनिरीक्षक को हत्या, हत्या का प्रयास, डकैती, लूट जैसे जघन्य अपराधों की विवेचना नहीं दी जाती है, जिसकी वजह से बदमाशों से उनका सामना होने की नौबत ही नहीं आती है।
अहम पदों पर तैनाती नहीं
पुलिस में महिला कर्मियों की अहम पदों पर तैनाती की परंपरा भी नहीं रही। प्रदेश पुलिस में कोई महिला डीजीपी की कुर्सी पर नहीं बैठी। हालांकि बीते कुछ सालों में कुछ बदलाव देखने को मिले हैं। लक्ष्मी सिंह को नोएडा का पुलिस कमिश्नर बनाया गया तो अनुपमा कुलक्षेष्ठ को आगरा जोन का एडीजी तैनात किया गया। जिलों में भी महिला थाने के अलावा एक और थाने में भी महिला को इंस्पेक्टर बनाने का आदेश जारी हुआ है। डीजीपी ने महिला कर्मियों से कार्यालय के बजाय फील्ड में कार्य कराने का भी आदेश दिया है।
जोखिम के कार्यों में बढ़ रही भूमिका
प्रदेश पुलिस में महिलाओं को भी अब जोखिम भरे कार्यों की जिम्मेदारी दी जा रही है। एटीएस में महिला कमांडो का दस्ता तैयार हो चुका है, जो अहम मौकों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहा है। इसी तरह पीएसी में तीन महिला बटालियन भी बन रही हैं, जो भविष्य में साहसिक कार्यों को अंजाम देगी। इसी तरह एसटीएफ भी महिला कर्मियों की संख्या को बढ़ाया जा रहा है।
पांच साल में मिले 72 मेडल
बता दें कि वर्ष 2020 से 2024 के बीच प्रदेश पुलिस के 72 पुलिसकर्मियों को राष्ट्रपति का वीरता पदक मिला, जिसमें केवल एक महिला अफसर मंजिल सैनी का नाम है। इस पदक के लिए किसी अन्य महिला पुलिसकर्मी को चयनित नहीं किया गया। माफिया, कुख्यात अपराधियों आदि के सफाए में उनकी भूमिका नहीं रही।
गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मिले राष्ट्रपति वीरता पदक
वर्ष संख्या
2020 23
2021 17
2022 01
2023 12
2024 19
कर रहीं साहसिक कार्य
महिला पुलिसकर्मियों द्वारा तमाम साहसिक कार्य किए जा रहे हैं। उन्हें जिले में महिला थाने के अलावा एक और थाने का प्रभारी बनाने का भी आदेश दिया गया है ताकि उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सके। साथ ही कार्यालय की जगह अब फील्ड में ड्यूटी ली जा रही है। गैलेंट्री के अलावा मुख्यमंत्री का वीरता पदक भी महिलाओं को मिला है।- प्रशांत कुमार, डीजीपी