भाजपा का सदस्यता व विस्तार अभियान पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के दिलों की धुकधुकी बढ़ाने लगा है। इसकी वजह उन पर सदस्य बनाने का दबाव नहीं बल्कि बाहर से आने वालों को पार्टी में दिया जा रहा महत्व है। जो पुराने हैं, वे पद प्रतिष्ठा पाने को तरस रहे हैं।
जिन्होंने पार्टी की पीठ में छुरा भोंका, बुरे दिन में छोड़कर चले गए या चुनाव के समय भाजपा को हराने की कोशिश की, ऐसे लोगों का महत्व बढ़ रहा है। केंद्र में भाजपा सत्ता में आई तो इनका मन बदला और भाजपा ने भी बड़ा दिल करते हुए उन्हें पार्टी में प्रवेश ही नहीं दिया बल्कि कार्यसमिति सदस्य और प्रदेश पदाधिकारी तक बना दिया।
ऐसे में पार्टी संविधान का कोई मतलब नहीं रहा। पुराने कार्यकर्ता आशंकित हैं कि कहीं संगठन का इस तरह हो रहा विस्तार उनकी पहचान ही समाप्त न कर दे।
दूसरे जिलों को छोड़ दें तो राजधानी लखनऊ में ही पार्टी संविधान को ठेंगा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। रामपाल वर्मा हाल में ही पार्टी में आए हैं और उन्हें जिला सह सदस्यता प्रमुख जैसी अहम जिम्मेदारी सौंप दी गई है।
इन्हें भी मिली बड़ी जिम्मेदारी
राजकुमार सिंह और बलराम वर्मा जैसे चेहरों को भी भाजपा में आए बहुत दिन नहीं हुए। इन्हें क्रमश: सरोजनीनगर और मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र का सह सदस्यता प्रमुख बना दिया गया है।
प्रदेश प्रभारी ओम माथुर भले ही यह मानते हों कि सदस्यता अभियान प्रारंभ हो जाने के बाद फेरबदल का कोई मतलब नहीं है क्योंकि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पर, प्रदेश भाजपा के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। शायद इसीलिए प्रदेश अध्यक्ष की देखादेखी जिलाध्यक्षों ने भी बदलाव शुरू कर दिया है। लखनऊ में तीन मंडलों (ब्लाकों) के अध्यक्ष हटा दिए गए हैं।
इसलिए देनी पड़ी जिम्मेदारी
लखनऊ के जिलाध्यक्ष राम निवास यादव सफाई देते हैं कि जो मंडल अध्यक्ष निष्क्रिय थे अथवा जिन्होंने कहा कि उनके पास सदस्यता अभियान के लिए वक्त नहीं है, उन स्थानों पर उनके सहयोगी के रूप में नए कार्यकर्ता को भी लगा दिया गया है।
हालांकि उनके पास इसका जवाब नहीं है कि उन्होंने पार्टी संविधान के किस नियम के तहत यह किया। पार्टी में अभी जल्द ही आए लोगों को सह सदस्यता प्रमुख बनाने के बारे में भी वह दिलचस्प तर्क देते हैं।
कहते हैं, जिस जाति के लोगों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है पार्टी के पास उस जाति का कोई प्रभावी चेहरा नहीं था। वह रामपाल वर्मा का उदाहरण देकर कहते हैं कि वर्मा अनुसूचित जाति के हैं। उन्हें अनुसूचित जाति के लोगों को पार्टी से जोड़ने के लिए सह सदस्यता प्रमुख बनाना पड़ा।
गैरों पर करम, अपनों पर सितम
बाहर से आए लोगों को सिर्फ सह सदस्यता प्रमुख ही नहीं बनाया गया है बल्कि अन्य जिम्मेदारियां देने में भी पार्टी नेतृत्व उदार दिख रहा है। बरेली के विक्रम सिंह पार्टी में आए और प्रदेश प्रवक्ता बन गए।
अतुल सिंह पार्टी में कब आए किसी को पता नहीं लेकिन प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बन गए। हरिश्चंद्र भाटी के साथ भी यही हुआ। बीएन मिश्र, रवीन्द्र राठौर, अंजू सिंह, बबिता जैसे कई ऐसे चेहरे हैं जो पता नहीं कहां से और कब आए और पार्टी के सबसे अहम फोरम प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बन गए।
जमीनी कार्यकर्ताओं की बेचैनी वे लोग भी बढ़ा रहे हैं जो बुरे दिनों में पार्टी छोड़ गए थे। अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निकाले गए, भितरघात करने वाले या बगावत करके चुनाव लड़ने वालों के साथ ऐसा चमत्कार हुआ कि उन्हें भाजपा में वापस इंट्री ही नहीं मिली बल्कि प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य भी बन गए।
हरनाथ यादव, रामसखी कठेरिया, भावना सिंह, जयप्रकाश निषाद व आईपी सिंह जैसे कई नाम इसी श्रेणी में हैं। कई कार्यकर्ता कहते हैं, बुरे दिन में हम संघर्ष करें व मार खाएं और मलाई वे काटें जो पार्टी की पीठ में छुरा भोंकें।