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संघ ने विश्व हिंदू परिषद को भी किया कटघरे में खड़ा

Sun, 19 Oct 2014 09:18 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दूसरे दिन कामकाज की समीक्ष्रा की। कामकाज की समीक्षा के दौरान विहिप भी कठघरे में खड़ी दिखी।
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सामने आया कि पिछले कई वर्षों से तमाम कोशिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विहिप व उसके सहयोगी संगठनों की समाज के बीच बहुत प्रभावी भूमिका नहीं दिखती।

उसके कार्यक्रमों में पहले जैसी संख्या भी नहीं जुटती। अभी हाल ही निकली विहिप की जनजागरण यात्राओं की कोई चर्चा न होने पर भी चिंता जताई गई।

बैठक के दूसरे दिन भी कोई महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने नहीं आया। विभिन्न संगठनों के कामकाज का लेखा-जोखा बताने की प्रक्रिया चलती रही।

बैठक के अंतिम दिन रविवार को दो प्रस्ताव लाए जा सकते हैं, जिनमें घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सली गतिविधियों, सीमा पर तनाव, केरल सहित विभिन्न राज्यों में हिंदुओं के उत्पीड़न व हत्याओं पर फोकस रह सकता है।
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अब कैम्पस में होगी संघ की एंट्री

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नौजवानों व किसानों के बीच पैठ बनाने के लिए जुटेगा। कोशिश होगी कि इनके बीच शाखाएं भी लगें।

संघ के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की यहां चल रही बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि केंद्र में सत्ता मिलने के बावजूद अभी लोगों के बीच काम करने की बहुत जरूरत है, खास तौर से नौजवानों व किसानों के बीच।

इनमें पैठ बनाए बगैर भविष्य की चुनौतियों से निपटना मुश्किल होगा। साथ ही मोदी के चलते मिली केंद्र की सत्ता पर कब्जा बनाए रखना भी मुश्किल होगा।

जानकार सूत्रों के मुताबिक, नौजवानों के बीच पहुंच व पकड़ बनाने के लिए संघ का मुख्य फोकस आईआईएएम, मेडिकल इंस्टीट्यूट, आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों पर होगा।

भगवा टोली के रणनीतिकारों का मानना है कि ऐसे युवाओं के सहयोग व समर्थन के बिना भविष्य में राजनीति सहित किसी भी क्षेत्र में प्रभावी भूमिका का निर्वाह मुश्किल होगा।

लक्ष्य तय किया गया कि इनके बीच संघ की शाखाएं न सिर्फ पहुंचें बल्कि सक्रियता व संख्या भी दिखे। बैठक में कहा गया कि किसानों की तमाम ऐसी समस्याएं हैं जिनसे जुड़कर उन्हें संघ से जोड़ा जा सकता है।

इससे न सिर्फ संघ की शक्ति बढ़ेगी बल्कि इस बहाने गांवों में पैठ व पकड़ भी मजबूत बन सकेगी। इस सिलसिले में भी कार्ययोजना बनाने का फैसला हुआ।

चुप क्यों है मोहन भागवत

दो दिन की बैठक में सरसंघचालक मोहन भागवत की भूमिका अभी तक सिर्फ श्रोता की ही रही। उद्घाटन के बाद शुक्रवार को वे पूरे दिन बैठक में बैठे सिर्फ सुनते रहे।

शनिवार को भी ऐसा ही हुआ। अब लोगों को रविवार का इंतजार है, जब भागवत बैठक का समापन करने के साथ ही अपनी बात रखेंगे।

उसी दौरान पता चलेगा कि उनकी नजर में कौन संगठन कहां पर खड़ा है और संघ को आगे किस दिशा में ज्यादा फोकस करना चाहिए।
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संघ ने केंद्र सरकार पर भी दिखाई तल्‍खी

केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में मोदी सरकार की नीतियों को लेकर तल्खी उजागर हो ही गई। स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ की तरफ से यह बात उठी कि आर्थिक व श्रमिक नीतियों पर केंद्र सरकार को श्वेतपत्र जारी करके जनता को भरोसे में लेना चाहिए। उसके बाद वह फैसले करे।

दरअसल, भारतीय मजदूर संघ इस बात से काफी क्षुब्ध है कि ‘श्रमेव जयते’ जैसी योजना लागू करते वक्त उससे प्रधानमंत्री या सरकार के किसी प्रतिनिधि ने बात करने की भी जरूरत नहीं समझी।

ऐसे में उन्हें मजदूरों के बीच जवाब देते नहीं बन रहा है। मजदूर संघ का यह भी मानना है कि इस योजना से पूंजीपतियों को लाभ मिलेगा। श्रमिकों का अहित होगा।

कामकाज की समीक्षा के दौरान जब स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ की बारी आई तो इन संगठनों ने एफडीआई को सीमा से ज्यादा बढ़ावा देने और पुराने श्रम कानूनों को खत्म करने के केंद्र सरकार के ऐलान पर क्षोभ जताया।

इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने आग्रह किया कि दोनों मुद्दों पर केंद्र सरकार को समझ-बूझकर फैसला करना चाहिए।

इस दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह सुरेश जोशी ‘भैयाजी’ चुपचाप बैठे रहे। माना जा रहा है कि इन संदर्भों पर दोनों रविवार को कुछ बोल सकते हैं।
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