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अब इबोला से डरने की जरूरत नहीं

Thu, 30 Oct 2014 11:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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विदेशों से आने वाला खतरा केवल बर्डफ्लू, इबोला ही नहीं हैं। कालाजार भी एक बड़ी बीमारी बनकर उभरी है जोकि विदेशों से भारत में पहुंच रही है।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक, कालाजार में ड्रग रेजिस्टेंस की दिक्कतों के चलते यह बीमारी खतरनाक रूप लेती जा रही है।

भारत सरकार भी इस बीमारी को अपनी प्राथमिकता में लेकर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के जरिए इसके खात्मे का काम करेगी।

सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) में 25वीं नेशनल कांग्रेंस ऑन पैरासिटोलॉजी में शनिवार को कालाजार बीमारी का मुद्दा उठा।

कांफ्रेंस में मुख्य अतिथि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के महानिदेशक और सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार डॉ. विश्वमोहन कटोच ने कहा कि हमें कालाजार की बीमारी को मिटाने के लिए काम करना होगा।

एक परजीवी बीमारी होने के चलते इसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। लाखों की संख्या में हर साल लोग पूरे देश में इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं।

केंद्र सरकार ने योजना बनाई है कि कालाजार की बीमारी को लेकर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाया जाए।

कालाजार की बीमारी को नियंत्रित करने के साथ इसकी बेहतर डायग्नोस्टिक और इलाज हम कर सकेंगे।

उन्होंने वैज्ञानिकों से भी कहा कि वह कालाजार सहित दूसरी बीमारियों के लिए अपने रिसर्च को प्रायोगिक शक्ल दें। इससे ज्यादा संख्या में मरीजों को फायदा मिल सके।
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विदेश यात्रा के चलन से बढ़ी बिमारियां

वहीं सीडीआरआई की बायोकेमिस्ट्री डिवीजन की वैज्ञानिक डॉ. नीना गोयल ने ड्रग रेजिस्टेंस की समस्या की ओर ध्यान खींचा। उनका कहना था कि ड्रग रेजिस्टेंस कालाजार के खात्मे में बड़ी बाधा है।

उनका कहना था कि पिछले सालों में विदेश यात्राओं का ट्रेंड लोगों में तेजी से बढ़ा है। ऐसे में कालाजार की बीमारी भी लोगों तक आसानी से पहुंच रही है।

किसी प्रभावी वैक्सीन या मच्छर जनित कार्यक्रम के नहीं होने के चलते स्थिति बिगड़ रही है। बीमारी से प्रभावित मरीज को बचाने के लिए हमारे पास कीमोथेरेपी और ऑर्गेनिक पेंटावेलेंट एंटीमोनियल्स फर्स्ट लाइन ड्रग इलाज के लिए मौजूद हैं।

इन दवाओं के लिए अब ड्रग रेजिस्टेंस परजीवी में विकसित हो चुका है। ऐसे में इलाज में बड़ी बाधा खड़ी हो गई है। इस रेजिस्टेंस की स्टडी बड़े स्तर पर किए जाने की जरूरत है।


डॉ. गोयल ने बताया कि सीडीआरआई ने इस पर काफी काम किया है। मॉलीक्यूलर मैकेनिज्म से इसकी वजह को पता करने में सफलता मिली है।

इस क्लीनिक रेजिस्टेंस को मापने के लिए एक्यूपी1 के घटते स्तर और थायोल्स के बढ़ते स्तर को बायोमार्क र्स की तरह उपयोग कर इस काम को बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
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हम इबोला से लड़ने के लिए तैयार

सीडीआरआई में मीडिया से रूबरू स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव और महानिदेशक आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच ने कहा कि देश को इबोला डरने की जरूरत नहीं है।

उनका कहना था कि यूएसए जैसे देशों तक इबोला वायरस के पहुंचने के बाद इसके भारत में आने की आशंका बढ़ गई है। हमारी लैब और हेल्थ सिस्टम इस खतरे से निपटने के लिए तैयार हैं।

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) और एनआईवी इस बीमारी की डायग्नोसिस के साथ इसके लिए इलाज विकसित करने में सक्षम हैं। देश में अलर्ट कर इबोला से ग्रसित किसी भी संदिग्ध मरीज के मिलने पर उसको आइसोलेट करने के आदेश दिए गए हैं।

एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर विशेष इंतजाम किए गए हैं। इबोला प्रभावित इलाकों से लौट रही भारतीय फौज के सदस्यों के अलावा कामगारों की जांच की जा रही है।

डॉ. कटोच ने कहा कि केंद्र सरकार अपनी पूरी कोशिश राज्य सरकारों के साथ मिलकर कर रही है। रविवार से 19 राज्यों के अधिकारियों का भी प्रशिक्षण केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम कर रही है।

अभी इबोला के लिए वैक्सीन या एंटी-वायरल नहीं है। ऐसे में इसका इलाज बड़ी समस्या है। बर्डफ्लू के समय हम भाग्यशाली थे कि टेमीफ्लू मौजूद थी। इबोला के लिए कोई दवा नहीं है।
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