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निघासन : भाजपा के सामने सीट बचाने की चुनौती, मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण पर सबकी नजर

Mon, 14 Feb 2022 12:26 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव केके मौर्य, अमर उजाला, लखीमपुर खीरी

सार

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी का घर इसी क्षेत्र में आता है। यहां के मौजूदा विधायक शशांक वर्मा भाजपा से हैं। इन्हें यह सीट विरासत में मिली है।
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भाजपाः शशांक वर्मा, सपाः आरएस कुशवाहा, बसपाः आरए उस्मानी, कांग्रेसः अटल शुक्ला। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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हाल ही हुई तिकुनिया हिंसा के बाद देशी-विदेशी मीडिया में सुर्खियां बने निघासन विधानसभा क्षेत्र पर सबकी नजर है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी का घर इसी क्षेत्र में आता है। यहां के मौजूदा विधायक शशांक वर्मा भाजपा से हैं। इन्हें यह सीट विरासत में मिली है। 2017 में इनके पिता राम कुमार वर्मा यहां से भाजपा विधायक बने। लेकिन दो साल बाद उनकी मौत हो जाने पर हुए चुनाव में शशांक विधायक चुने गए। पर, इस बार सीट बचाना भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि, सपा और बसपा उम्मीदवार भी मजबूती से दावेदारी पेश कर रहे हैं।

सपा ने निघासन से एक बार बसपा के टिकट पर चुनाव जीत चुके आरएस कुशवाहा को अपना उम्मीदवार बनाया है। जबकि बसपा ने हाल ही सपा छोड़कर पार्टी में शामिल हुए आरए उस्मानी को मैदान में उतार है। कांग्रेस ने अटल शुक्ला पर दांव लगाया है। मुस्लिम मतदाता यहां अच्छी खासी संख्या में हैं। यदि आरए उस्मानी सपा की ओर मुस्लिमों का ध्रुवीकरण रोकने में कामयाब होते हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा। भाजपा को भरोसा है कि बसपा प्रत्याशी जितना मुस्लिम वोट अपने पक्ष में कर लेेंगे, उतना उनका प्रत्याशी मजबूत होगा। भार्गव बिरादरी के वोटरों की संख्या भी काफी है, जिसे भाजपा अपना मान रही। 

शशांक वर्मा कुर्मी बिरादरी से आते हैं। इसलिए इसे वे अपना परंपरागत वोट मानकर चल रहे हैं। सपा की स्थिति यहां पहले से मजबूत हुई है। सपा प्रत्याशी आरएस कुशवाहा बसपा से इसी सीट से विधायक रह चुके हैं। इस नाते दलितों में भी उनकी पैठ है। कुशवाहा बिरादरी में उनकी पकड़ है। मुस्लिम, सिख, मौर्य, यादव और अन्य कुछ पिछड़ी जातियों के वोट भी सपा अपना मान रही है। बसपा समर्थक और प्रत्याशी शांतिपूर्वक प्रचार में जुटे हैं। उसे भरोसा है कि मुस्लिम, दलित बिरादरी का वोट तो उसे मिलेगा ही। ब्राह्मण मतदाता भी उसके पक्ष में है। 

सभी को आजमाया : आजादी के बाद से अब तक दो उपचुनाव समेत 19 बार विधानसभा चुनाव हुए। इनमें पांच बार कांग्रेस, एक बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, तीन बार जनसंघ, तीन बार सपा, चार बार भाजपा, एक बार बसपा और दो बार निर्दलीय उम्मीदवार जीते। निघासन में कभी जातीय आधार पर चुनाव नहीं हुआ। अब तक यहां चार बार क्षत्रिय, चार बार ब्राह्मण, तीन बार वैश्य, दो बार सिख, पांच बार कुर्मी और एक बार मौर्य बिरादरी के विधायक चुने गए। 

विकास को लेकर जनता के सवाल

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चुनावी घमासान के दौर में यहां खूब वादे और दावे हो रहे हैं। पर, मतदाताओं में ऐसे दावों और वादों पर सवाल भी बहुत हैं। निघासन के व्यापारी एके चौबिया चुनावी चर्चा छिड़ते ही कहते हैं, जनप्रतिनिधियों ने कभी यहां की समस्याओं पर ध्यान दिया ही नहीं। सिंगाही की मांडवी शाक्य भी इस सवाल को और स्पष्ट कर देती हैं। वह कहती हैं, क्षेत्र में न तो शैक्षिक विकास हुआ और न ही स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हो सका। छात्रा उर्वशी श्रीवास्तव मांडवी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, लड़कियों की शिक्षा के लिए तो यहां कोई इंतजाम ही नहीं है। अधिवक्ता लतीफ विकास को लेकर अपनी बात अलग तरीके से रखते हैं। वह कहते हैं, यहां मुंसिफ कोर्ट का भवन बन कर तैयार है। पर, अब तक शुरू नहीं हो सका। यहां के जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र के विकास की ओर थोड़ा भी ध्यान दिया होता, तो आज तस्वीर दूसरी होती।

2017 क़ा चुनाव परिणाम

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रामकुमार वर्मा, भाजपा  1,07,487
कृष्ण गोपाल पटेल, सपा  61,364
जीएस सिंह, बसपा  40,674

वोटों का गणित
3,39,473
कुल मतदाता
दलित 80 हजार
मुस्लिम 65 हजार
मौर्या 40 हजार
ब्राह्मण 15 हजार
यादव 20 हजार
कुर्मी 20 हजार
सिख  18 हजार
लोधी  22 हजार
लोनिया 12 हजार
वैश्य  25 हजार
तेली, तंबोली 15 हजार

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