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नाई बनाम नेहरू के जमाई: फिरोज के इस विरोधी के लिए इंदिरा खुद बनाती थीं चाय, सब साथ बैठकर करते थे चर्चा

Tue, 04 Jan 2022 12:12 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

नंद किशोर नाई रायबरेली से फिरोज गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। जब उनके पास नामांकन दाखिल करने के पैसे नहीं तो फिरोज ने खुद उन्हें मदद की पेशकश की पर नंद किशोर ने इनकार कर दिया। पढ़ें, ये रोचक किस्सा
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नंद किशोर नाई व फिरोज गांधी। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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वैसे तो समाजवादी चिंतक नंदकिशोर नाई का नाम आम तौर पर लोगों ने कम ही सुना होगा। पर, उन्नाव के बीघापुर के ओसिया गांव में 4 अक्तूबर 1924 को जन्मे नंद किशोर बड़े समाजवादी विचारक थे। उन्होंने शोषित एवं पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के लिए काफी लंबा संघर्ष किया। प्रख्यात समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया के कई वर्षों तक सचिव रहे नंद किशोर के पिता गांव में जजमानी का काम करते थे। हालांकि, उनके पिता बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उन्होंने पुत्र नंद किशोर की पढ़ाई लिखाई पर काफी ध्यान दिया।

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डॉ. लोहिया ने नंद किशोर को 1957 के लोकसभा चुनाव में पं. जवाहर लाल नेहरू के दामाद फिरोज गांधी के खिलाफ रायबरेली से प्रत्याशी बना दिया। नंद किशोर के बारे में बताते हुए लखनऊ के महापौर रहे डॉ. दाऊ जी गुप्त ने हमें बताया था कि उन दिनों सोशलिस्ट पार्टी को कोई गंभीरता से नहीं लेता था। जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में गठित सोशलिस्ट पार्टी को ‘पागलों का समूह’ बताते थे। सोशलिस्ट पार्टी को कोई आसानी से चंदा भी नहीं देता था। डॉ. दाऊ जी ने बताया था, फिरोज गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के दौरान घटे इस किस्से की जानकारी उन्हें खुद नंद किशोर जी ने पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त के यहां एक बार दी थी।

नामांकन फीस 500, पर लोहिया की जेब से निकले सिर्फ 300
बकौल दाऊ जी, डॉ. लोहिया ने फिरोज गांधी के खिलाफ नंदकिशोर को चुनाव लड़ाने का फैसला ले लिया। नंदकिशोर जब दिल्ली से चलने लगे तो डॉ. लोहिया ने जेब में हाथ डालकर रुपये निकाले। सिर्फ 300 रुपये निकले। वह रुपये नंदकिशोर को
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देते हुए कहा, बाकी का इंतजाम चंदा से कर लो, क्योंकि 300 रुपये से ज्यादा दे पाना मेरेे वश में नहीं है। फिरोज गांधी अपनी पत्नी इंदिरा गांधी, जो बाद में देश की प्रधानमंत्री हुईं, के साथ रायबरेली कचहरी में नामांकन करने आए। उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया और फिर बाहर आकर बैठ गए। लोगों ने जब चलने के लिए कहा तो वह बोले, मैं नंदकिशोर को देखना चाहता हूं। डॉ. लोहिया ने जिन्हें मेरे खिलाफ प्रत्याशी बनाया है।

फिरोज बोले, तुमने प्रचार में तो बाजी मार ली
नंदकिशोर के पास सिर्फ 300 रुपये थे, जबकि नामांकन की फीस 500 रुपये थी। नंदकिशोर कचहरी पहुंचे। उनके साथ उनके समर्थक भी थे। नंदकिशोर ने वहां मौजूद लोगों के सामने कहा, मेरे पास सिर्फ 300 रुपये हैं। मुझे पं. नेहरू जी के दामाद फिरोज गांधी साहब के खिलाफ चुनाव लड़ना है। मुझे चंदा चाहिए। नंदकिशोर के समर्थकों ने लोगों से पैसे मांग-मांगकर नामाकंन की फीस जुटानी शुरू की। फिरोज गांधी ने नंदकिशोर को बुलाया और कहा, यह 200 रुपये लो और अपना परचा दाखिल कर दो। पर, नंद किशोर ने मना कर दिया। हाथ जोड़कर फिरोज गांधी से कहा, साहब! मैं आपके खिलाफ चुनाव लड़ रहा हूं। इसलिए आपसे ही पैसा लेकर आपके खिलाफ उम्मीदवार बनना शोभा नहीं देता। जैसे-तैसे चंदे से 200 रुपये हुए तो उन्होंने परचा दाखिल किया। परचा दाखिल करके नंदकिशोर बाहर आए तो सामने फिरोज गांधी खड़े थे। उन्होंने नंदकिशोर की पीठ ठोंकी। बोले, नंदकिशोर आपने प्रचार में मुझसे बाजी मार ली। नंदकिशोर बोले, कैसे! फिरोज गांधी ने कहा, तुमने चंदा मांगकर जिले के गरीबों को यह संदेश दे दिया कि तुम ही वास्तव में उनके आदमी हो। तुम ही उनके प्रतिनिधि होने लायक हो।

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जिसके लिए इंदिरा गांधी खुद बनाती थीं चाय

नामांकन के बाद फिरोज गांधी का एक आदमी नंदकिशोर के पास आया और उनका संदेश दिया, शाम को साहब ने अपने निवास पर चाय पर बुलाया है। नंदकिशोर शाम को फिरोज गांधी के निवास पर पहुंचे। वहां इंदिरा गांधी एवं फिरोज गांधी ने उनका दरवाजे पर स्वागत किया। अंदर ले गए। साथ चाय पी। काफी देर तक बात करते रहे। फिर वह नंदकिशोर को बाहर तक छोड़ने आए। हाथ मिलाया और बोले, चुनाव चलता रहेगा, लेकिन कभी-कभी चाय व काॅफी भी चलती रहे। चुनाव लड़ने के दौरान
यह सिलसिला चलता रहा।

अक्सर फिरोज गांधी और नंदकिशोर शाम को एक साथ बैठते। बाद में तो नंदकिशोर जब भी फिरोज गांधी के यहां पहुंचे, तो इंदिरा गांधी खुद अपने हाथ से नंदकिशोर के लिए चाय व काफी बनातीं और पति फिरोज एवं नंदकिशोर के साथ खुद भी बैठतीं। कुछ लोगों ने इसकी शिकायत डॉ. लोहिया से की, तो लोहिया बोले, इसमें क्या बुराई है? लोकतंत्र है। हम कांग्रेस से वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं, न कि निजी। वैचारिक लड़ाई में संवाद बना रहे, यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है।
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