कहा जा रहा है कि बाबा प्रेमदास की कानूनी लड़ाई रंग लाने लगी थी। कई साल की लड़ाई के बाद कब्जे वाली जमीन मंदिर के नाम दर्ज करा दी गई थी। बस जमीन पर कब्जा दिलाना बाकी थी।
जमीन पर कब्जा दिलाने की जिम्मेदारी राजस्व विभाग की थी, लेकिन आरोपियों की पहुंच ऊपर तक होने की वजह से तहसील प्रशासन मौन साधे था। सीओ डलमऊ विनीत सिंह का कहना है कि जमीन ट्रस्ट के नाम हो गई थी। बस कब्जा दिलाने की प्रक्रिया चल रही थी।
मृतक महंत स्वामी प्रेमदास और आरोपियों के बीच जमीन को लेकर गहरा विवाद चल रहा था। बीच-बीच में प्रेमदास को जान से मारने की धमकी मिलती थी। करीब तीन माह पहले मृतक को जान से मारने की धमकी मिली थी, जिसकी एफआईआर सदर कोतवाली में दर्ज कराई गई थी।
यही नहीं आरोपी पक्ष की तरफ से भी मृतक के खिलाफ ऊंचाहार थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। अंतत: आस्था के मंदिर को बचाने की लड़ाई में बाबा प्रेमदास को मौत के घाट उतार दिया गया।