‘अपने देश में खास तौर से हिंदू वर्ण-व्यवस्था के तहत जात-पात, ऊंच-नीच व छुआछूत पर आधारित गैर बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था सदियों से है।
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इसके तहत चौथे वर्ण अर्थात शूद्र समाज को जिन्हें अब अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के नाम से जाना जाता है, इन्हें उच्च वर्ण के लोगों द्वारा अपना गुलाम व लाचार बनाकर रखा गया। इस दौरान इन्हें जानवरों से भी बदतर जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर किया गया था...।’
बसपा सुप्रीमो मायावती ने बीते रविवार को बसपा कार्यकर्ताओं के ऑल इंडिया सम्मेलन में दलितों व पिछड़ों को एक साथ रखते हुए सवर्णों को उनके उत्पीड़क के रूप में पेश किया। बसपा सुप्रीमो के इस बयान को पार्टी की नई रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
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इसलिए हो सकते हैं बदलाव
पार्टी के भीतर और बाहर यह चर्चा आम है कि बसपा एक बार फिर दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण वाली सोशल इंजीनियरिंग के पहले वाली लाइन की ओर लौट रही है।
इसे 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में सवर्णों के बसपा का साथ न देने से हुए सियासी नुकसान से मिले अनुभव के असर के रूप में भी देखा जा रहा है।
बसपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि पार्टी का पूरा जोर अपने आधार दलित वोट को पहले की तरह एकजुट रखना है। वे पार्टी की रणनीति का संकेत करते हुए कहते हैं कि सत्ता में आने के बाद भाजपा सांप्रदायिक कार्ड खेलने में जुट गई। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों व दलितों का हुआ।
ये है मायावती का मकसद
भाजपा में जो दलित नेता हैं, उनकी उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। बसपा लोगों को यही समझाना चाह रही है कि भाजपा अब भी दलित-पिछड़ा व मुस्लिम विरोधी मानसिकता से उबर नहीं पाई है।
केंद्र की भाजपा सरकार दलितों व पिछड़ों को आरक्षण का फायदा न देने के लिए सरकारी सेक्टर के काम को प्राइवेट सेक्टर के सुपुर्द करने का काम कर रही है।
ऐसे में बसपा छोड़कर वे कहीं भी भटकेंगे तो उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सकता जो बसपा देती है।
बनाया जाएगा सवर्णों का कैडर
दूसरा, सूबे का मुस्लिम समाज सपा सरकार से बेहद नाराज है। प्रदेश में इतने दंगे हो गए कि वह त्राहि-त्राहि कर रहा है। सपा सरकार उन्हें संरक्षण दे पाने में नाकाम साबित हुई है।
बसपा की जगह सपा को सूबे की सत्ता देकर अब वे भी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। इसके अलावा पिछड़ों में यादव को छोड़कर सब उपेक्षित हैं। सपा के विकल्प में ये सभी बसपा के साथ होंगे। बसपा के लिए दलित, पिछड़ा और मुस्लिम का साथ आने वाले चुनाव में भाजपा से लड़ाई का बेहतर विकल्प होगा।
इस नेता के हिसाब से सपा विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई से दूर रहेगी। बसपा का पूरा जोर दलित-पिछड़ा और मुस्लिम समाज को पार्टी से जोड़ने पर है।
एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि पार्टी अब सवर्णों को सिर्फ जोड़ने पर ध्यान नहीं देगी। उन्हें कैडर बनाया जाएगा ताकि वे स्थायी रूप से बसपा के साथ चल सकें।
जल्द मिलेगी कामयाबी
दलित चिंतक प्रो. काली चरन सनेही कहते हैं, बसपा यदि इस रणनीति पर अमल कर सकी तो उसे अपनी पुरानी राजनीतिक हैसियत पाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
उपचुनाव में अपने कैडर को सपा और भाजपा की ओर न जाने देने के लिए सीटवार निर्दल प्रत्याशी के पक्ष में उतरने की रणनीति उपयोगी साबित हो सकती है। इससे उसे अंदाजा हो जाएगा कि दलितों पर उसकी कितनी पकड़ रह गई है।
यदि बसपा द्वारा इंगित निर्दल प्रत्याशी को उम्मीद के हिसाब से वोट मिले तो उनकी रणनीति कामयाब हो जाएगी, वरना नए सिरे से सोचने का मौका भी मिल जाएगा।
एक बात और, सवर्ण समाज में अब भी बसपा की सोच वाले काफी लोग हैं। बसपा को उन्हें निराश नहीं करना चाहिए।
वहीं, बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर कहते हैं कि बसपा समतामूलक समाज पर विश्वास करती है। पार्टी अध्यक्ष ने अपने शासनकाल में सभी वर्गों को बराबरी व मान-सम्मान दिलाया।
बसपा किसी भी धर्म या समाज की विरोधी नहीं है, पर एक सच्चाई यह भी है कि सवर्ण समाज पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में गुमराह हुआ।
हालांकि प्रदेश में सपा सरकार व केंद्र में भाजपा सरकार को देखने के बाद उसका भ्रम दूर हो गया है। उम्मीद है दलितों-पिछड़ों के साथ अगड़ा समाज फिर से पार्टी से जुड़ेगा और यह जुड़ाव स्थायी होगा।