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बना रहे गठबंधन में प्यार, जयंत बने उम्मीदवार: लोकसभा चुनाव और भविष्य की उम्मीदों को देखते हुए अखिलेश ने उठाया सियासी कदम

Thu, 26 May 2022 03:46 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमित मुद्गल, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

जयंत को राज्यसभा भेजने का निर्णय दूरगामी सोच के साथ किया गया है। चूंकि भाजपा ने चुनाव में जयंत के लिए अपने दरवाजे स्पष्ट रूप से खोल रखे थे और तमाम सियासी गुणा भाग लगाए गए थे। बावजूद इसके जयंत सपा के साथ रहे।
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जयंत चौधरी और अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रालोद प्रमुख जयंत चौधरी को राज्यसभा के लिए सपा रालोद का संयुक्त प्रत्याशी घोषित कर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अहम सियासी कदम उठाया है। अखिलेश ने भविष्य की संभावनाओं को मजबूती देने केलिए यह फैसला लिया। साथ ही यह संदेश देने की भी कोशिश की कि गठबंधन में आपसी प्यार और सम्मान बना रहेगा। आपसी वादे पूरे करने की कोशिश की जाएगी।

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यूपी के लिए राज्यसभा की कुल 11 सीटों पर चुनाव हो रहा है। इसमें बीजेपी को सात और सपा को तीन सीटें मिलना तय हैं। जबकि 11 वीं सीट के लिए दोनों दलों के बीच संघर्ष होगा। सपा की तरफ से कपिल सिब्बल और जावेद अली नामांकन कर चुके है। ऐसे में तीसरी सीट के लिए मंथन चल रहा था। सामने आया कि डिंपल यादव को तीसरे सदस्य के रूप में राज्यसभा भेजने की तैयारी है। इस पूरी कहानी में बुधवार को तब मोड़ आया जब लखनऊ में रालोद के विधायकों ने अखिलेश यादव से मुलाकात की।

 

चूंकि सदन चल रहा है तो रालोद विधायक लखनऊ में ही थे। उन्होंने मजबूती से अपनी बात रखी और कहा कि भले ही इस बाबत वादे हुए हो या न हुए हों पर गठबंधन का सरोकार और वक्त का तकाजा यही कहता है कि जयंत को राज्यसभा भेजा जाए। चूंकि यह बात तो तय है कि भले ही सपा और रालोद गठबंधन अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाया हो पर दोनों ने मिलकर मजबूती से चुनाव लड़ा और तमाम ऑफर के बावजूद जयंत गठबंधन के साथ मजबूती से खड़े रहे। चुनाव में पूरी ताकत लगाई। रालोद नेताओं ने यह बात रखी कि अब गठबंधन धर्म निभाने का फर्ज आया तो उससे निभाया जाना चाहिए। परिणाम यह रहा कि अखिलेश ने यह घोषणा कर दी कि उनकेउम्मीदवार जयंत होंगे।

2024 का लोकसभा चुनाव है लक्ष्य
जयंत को राज्यसभा भेजने का निर्णय दूरगामी सोच के साथ किया गया है। चूंकि भाजपा ने चुनाव में जयंत के लिए अपने दरवाजे स्पष्ट रूप से खोल रखे थे और तमाम सियासी गुणा भाग लगाए गए थे। बावजूद इसके जयंत सपा के साथ रहे। ऐसे में अखिलेश यह बात भली भांति जानते हैं कि यदि अब रालोद की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा गया तो वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कहीं गठबंधन की गांठ खुल न जाए। यदि सपा रालोद साथ रहे तो लोकसभा चुनाव में लाभ हो  सकता है पर यदि नाराजगी हो गई और जयंत चले गए तो निश्चित रूप से पश्चिमी उप्र में सपा की राह मुश्किल हो सकती है।

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....ताकि बना रहे जाट मुस्लिम समीकरण
यह विधानसभा चुनाव गठबंधन ने खास तौर पर जाट मुस्लिम समीकरण के आधार पर ही लड़ा था। खास तौर से पश्चिमी उप्र में जाटों और मुस्लिमों ने इस समीकरण को साधने की पूरी कोशिश भी की। मुस्लिम तो पूरी शिद्दत से सपा के साथ ही थे। उधर जाटों ने भी गठबंधन का खूब साथ दिया। हालांकि भाजपा के साथ भी काफी जाट गए और उसे इसी का लाभ मिला। बावजूद इसके पश्चिमी उप्र में यदि मुस्लिमों के साथ जाट समीकरण बना है तो इसमें रालोद का ही अहम रोल है अखिलेश ने इस समीकरण को मजबूती देने के इरादे से भी यह कदम उठाया है।

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