लोहिया संस्थान में 100 वां किडनी ट्रांसप्लांट, मां ने बेटे को गुर्दा दान कर दी नई जिंदगी
लखनऊ। लोहिया संस्थान ने बृहस्पतिवार को 100वां किडनी ट्रांसप्लांट कर नया रिकॉर्ड बनाया है। इसमें मां ने बेटे के लिए किडनी दान की है। अब मरीज और डोनर की हालत में सुधार है। इस मरीज का ट्रांसप्लांट असाध्य रोग कार्ड योजना में निशुल्क किया गया है।
राजधानी निवासी 29 साल के युवक को कुछ समय से पैरों में सूजन, पेशाब कम होने, सांस लेने में दिक्कत सहित अन्य तरह की समस्याएं थीं। जांच के दौरान पता चला कि उसकी किडनी में समस्या है। इस पर उसकी डायलिसिस की गई। करीब आठ माह तक डायलिसिस करने के बाद किडनी ट्रांसप्लांट का फैसला लिया गया। इसके बाद डोनर की तलाश हुई। परिवार के सदस्यों से मैचिंग कराई गई। मरीज की मां की किडनी ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त पाई गई। इस पर बृहस्पतिवार को ट्रांसप्लांट किया गया। यह संस्थान में 100वां किडनी ट्रांसप्लांट है। डॉक्टरों ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद मरीज और डोनर की हालत में सुधार है। दोनों अभी आईसीयू में हैं। उनकी निगरानी की जा रही है। नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अभिलाष चंद्रा ने बताया कि यह प्रत्यारोपण असाध्य रोग कार्ड योजना के तहत किया गया है। ऐसे में मरीज से कोई चार्ज नहीं लिया गया है।
2016 से चल रहा है ट्रांसप्लांट
लोहिया संस्थान में 2016 से किडनी ट्रांसप्लांट शुरू हुआ था। तीन सालों में 50 मरीजों का ट्रांसप्लांट हुआ। लेकिन 2019 से इसमें तेजी आई। दो साल में 50 किडनी ट्रांसप्लांट किया गया।
90 फीसदी है सफलता दर
नेफ्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अभिलाष चंद्रा का दावा है कि पहले साल में किडनी प्रत्यारोपण की दर 90 फीसदी से अधिक होती है। इसके बाद धीरे-धीरे इसमें गिरावट आती है। यह मरीज की स्थिति के ऊपर भी निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि संस्थान में ट्रांसप्लांट कराने वाले करीब 80 फीसदी मरीज फालोअप में आ रहे हैं। इन मरीजों में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। करीब 30 से 40 फीसदी मरीज 10 साल तक ठीक रहते हैं।
कोविड की वजह से कम हुए प्रत्यारोपण
डॉ. अभिलाष चंद्रा ने बताया कोविड ने प्रत्यारोपण की रफ्तार कुछ धीमी कर दी थी, वरना किडनी प्रत्यारोपण का शतक बीते साल ही पूरा हो जाता। कोविड की वजह से संस्थान में कई माह तक प्रत्यारोपण बंद रहा। इस दौरान कुछ मरीजों की वेटिंग भी बढ़ गई। अभी 20 से अधिक मरीज प्रत्यारोपण की वेटिंग में हैं।
प्रत्यारोपण में दो से तीन माह का समय
डॉ. अभिलाष चंद्रा ने बताया संस्थान में किडनी प्रत्यारोपण के आने वाले मरीजों की जांच पड़ताल कराने संग मैचिंग समेत अन्य चिकित्सकीय मानकों पर परखने बाद दो से तीन माह में प्रत्यारोपण किया जा रहा है। कई बार डोनर न मिलने से प्रत्यारोपण में देरी होती है।