डॉ. रजनीकांत
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स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से शिल्पकारों, बुनकरों व भूमिहीन महिलाओं व बच्चों को आर्थिक रूप से सबल बनाने वाले पद्मश्री डॉ. रजनीकांत बताते हैं कि सैकड़ों साल पुरानी हस्तनिर्मित बनारसी साड़ी व ब्रोकेड का करीब 1500 करोड़ का उद्योग है। इसमें करीब 6 लाख लोग काम करते हैं। इसी तरह भदोही की हस्तनिर्मित कालीन का 8 हजार करोड़ का कारोबार है और 10 लाख लोग इससे जुड़े हैं।
मिर्जापुर की दरी का अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब 200 करोड़ का कारोबार है और 50 हजार शिल्पी व बुनकर इससे जुड़े हैं। इसी तरह बनारस मेटल रिपोजी क्राफ्ट का 100 करोड़, बनारस गुलाबी मीनाकारी क्राफ्ट का 15 करोड़ का कारोबार है, वाराणसी के हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्तियां व औजार के कारोबार से करीब 2000 शिल्पी जुड़े हैं और 5-7 करोड़ का कारोबार करते हैं।
बनारस में ही ग्लास बीड्स को मोती स्वरूप देकर फैंसी माला व डेकोरेटिव आइटम और सॉफ्टस्टोन जाली वर्क का अच्छा कारोबार है। चुनार के बलुआ पत्थर पर नक्काशी का उद्योग करीब 300 करोड़ का है। आजमगढ़ के निजामाबाद की ब्लैक पाटरी का करीब दो करोड़ और गाजीपुर के हैंगिग क्राफ्ट का काम 3000 परिवारों को रोजी-रोटी मुहैया कराता है।
वाराणसी परिक्षेत्र में हस्तशिल्प उद्यमों से करीब 20 लाख हस्तशिल्पी जुड़े हैं और 20,500 करोड़ का कारोबार करते हैं। 11 हस्तशिल्प उत्पादों को जीआई सर्टिफिकेट मिल चुका है। लेकिन मौजूदा संकट ने हस्तशिल्पियों को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है।
सोहित कुमार प्रजापति और कैसरजहां अहमद।
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आजमगढ़ के सोहित कुमार प्रजापति कहते हैं कि ब्लैक पाटरी व टेरोकोटा के हस्तशिल्प से करीब 5 करोड़ का कारोबार है। मुख्य तौर पर दीया, करवा, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति के साथ विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तनों के अलावा फ्लावर पॉट बनाए जाते हैं। दुबई, चीन और अमेरिका तक इन उत्पादों की मांग है। 80 प्रतिशत उत्पाद निर्यात होता है। दीवाली से जुड़े उत्पाद अगस्त तक चले जाते हैं, लेकिन ज्यादातर ऑर्डर कैंसिल हो गए हैं। इससे पूंजी फंस गई है। मिट्टी का दीया व करवा मुंबई जाता है। एक करवा की कीमत 7-8 रुपये मिलती है। 50 ट्रक से ज्यादा करवा मुंबई जाता है। अब कारोबारी 5 रुपये देने की बात कर रहे हैं। बड़ा नुकसान हुआ है। सरकार तैयार सामान खरीदने की व्यवस्था करे और कुछ पूंजी दे तभी यह उद्योग आगे बढ़ पाएगा। स्थिति सामान्य होने पर नए काम के लिए पूंजी नहीं बची है।
सरकार चीनी माल के आयात पर प्रतिबंध लगाए : अहमद
गाजीपुर की मूंज को रंगकर देवी-देवताओं के चित्र, घरों के दृश्य, लैंडस्केपिंग, चिड़िया व जानवरों की कलाकृतियां वाल हैंगिंग क्राफ्ट के रूप में प्रसिद्ध है। यहां के कैसरजहां अहमद बताते हैं कि गाजीपुर व आसपास के जिलों में इस हस्तशिल्प से करीब 3000 परिवार जुड़े हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस उत्पाद का निर्यात कम हुआ तो केंद्र सरकार ने 2018 में जीआई रजिस्ट्रेशन कर इस उत्पाद को नए सिरे से पहचान दिलाने का काम किया।
देश के टूरिस्ट पैलेस, धार्मिक स्थलों व प्रदर्शनियों में भागीदारी का अवसर मिला, जिससे निर्यात में कमी की भरपाई होने लगी। एक जिला-एक उत्पाद योजना से भी बहुत मदद मिली। लेकिन, लॉकडाउन से पूंजी फंस गई है। वहीं, चीन मशीनों से इसी तरह का माल तैयार करता है। यह माल अपने देश में भी आता है। इससे ऑर्डर कम मिलता है। सरकार चीनी माल के आयात पर प्रतिबंध लगाए। चीन निर्मित उत्पाद टिकाऊ नहीं हैं। जबकि देश निर्मित उत्पाद इको फ्रेंडली व लंबे समय तक चलने वाले होते हैं। शिल्पियों के उत्पाद बिकने का अवसर उपलब्ध कराए।
लक्ष्मी चंद्र प्रजापति ओर रामेश्वर सिंह।
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गोरखपुर के टेरोकोटा का कुछ दिन पहले ही जीआई रजिस्ट्रेशन हुआ है। टेराकोटा की मूर्तियां, खिलौने, कलाकृतियों की देश में खूब डिमांड है। जीआई रजिस्ट्रेशन कराने वाले लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह के अध्यक्ष लक्ष्मी चंद्र प्रजापति बताते हैं कि भटहट ब्लॉक के औरंगाबाद के आसपास के करीब 400 परिवार इससे जुड़े हैं। हर एक से डेढ़ महीने में एक ट्रक माल तैयार होता है। यहां के उत्पाद पुणे, मुंबई, जयपुर, पश्चिम बंगाल के कारोबारी थोक में ले जाते हैं।
प्रति ट्रक करीब 4-5 लाख रुपये मिलते हैं। वर्ष भर का करीब 4 करोड़ का कारोबार लोग कर पाते हैं। मिट्टी, कंडा, पुआल व पारिश्रमिक मिलाकर करीब 50 प्रतिशत उत्पाद पर खर्च होता है। बाकी आय होती है। इसी से परिवारों की जीविका चलती है। दिवाली के पहले उत्पाद की ज्यादा डिमांड होती है। लेकिन लॉकडाउन से स्थिति खराब हो गई है। रही-सही पूंजी भी खत्म हो गई है। ऐसे ही कुछ दिन और चला तो खाने के लाले पड़ जाएंगे।
कारीगरों के लिए दूध-सब्जी का बंदोबस्त तक मुश्किल: रामेश्वर
वाराणसी में लकड़ी के खिलौने बनाने वाले रामेश्वर सिंह कहते हैं कि करीब 1500 कारीगर व 10 हजार लोग इससे जुड़े हैं। शादी और नवरात्र सबसे अच्छा सीजन होता है। सिंदूर की डिबिया, सिंधोरा व सिंदूरदान की बड़ी डिमांड होती है। दिल्ली, मुंबई व कोलकाता से इसकी मांग ज्यादा रहती है। एक महीने में करीब 80 से 90 लाख का सामान तैयार होकर जाता है।
इस बार शादी व नवरात्र का सीजन खाली चला गया। मशीनें बंद हो गईं। इससे कारीगारों की स्थिति बहुत खराब है। सरकार ने 15 दिन का राशन दिया है। लेकिन दूध, सब्जी की जरूरत कैसे पूरी हो, यह समस्या है। वे कहते हैं कि अब पार्टियां फोन तक नहीं उठा रही हैं, जिससे यह अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि आगे क्या किया जाए। यह भी पता नहीं है कि कितने दिन तक यह स्थिति रहेगी। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
मिर्जापुर के दरी कारोबार से करीब 10 हजार लोग जुड़े होंगे। वाराणसी, सोनभद्र व प्रयागराज के आसपास तक लोग इससे जुड़े हैं। दरी कारोबारी प्यारेलाल बताते हैं कि भदोही से दरी का मैटेरियल आता है। भदोही में कुछ काम शुरू हुआ है, लेकिन बाहर के लोग नहीं जाने पा रहे। इससे माल नहीं आ पा रहा है। कारोबार पूरी तरह ठप है। कंपनियों ने ऑर्डर दिया था, उसे रोक दिया। नया ऑर्डर मिल नहीं रहा है। वह बताते हैं कि वे लोग कुछ काम प्रदर्शनियों में शामिल होने के लिए तैयार करते हैं। इसका 400-500 रुपये प्रतिदिन मिलता है। लेकिन जो काम ऑर्डर पर करके देते हैं, उसका बमुश्किल 200-250 रुपये ही मिलता है। वह कहते हैं कि बिना सरकार की ओर से पूंजी की मदद मिले नया काम संभव नजर नहीं रहा।
ये हैं उद्यमियों की मांगें
- हस्तशिल्प में सपोर्ट से जुड़ी जो सरकारी यूनिट हैं, उनके ऋण का ब्याज माफ हो।
- नई पूंजी के लिए ब्याजमुक्त ऋण मिले और दूसरे देशों की डिजाइन के बारे में वर्कशाप कराकर प्रशिक्षण दिलाया जाए।
- स्थिति सामान्य होते ही बड़े शहरों, पर्यटन व धार्मिक स्थलों पर मेला-प्रदर्शनी का आयोजन कर उसमें शामिल होने का मौका दिया जाए।
- कच्चा माल महंगा होता जा रहा है। यह सस्ते में मिले, इसका प्रबंध हो।
- उत्पादों को एयरपोर्ट, स्टेशनों व महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रदर्शन के लिए लगवाया जाए।
- हस्तशिल्प से जुड़े स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक मदद दी जाए। उद्योगों को चलाने के लिए सरकार से पूंजी मिले।
- ट्रेनों का संचालन शुरू हो जिससे माल की आवाजाही शुरू हो सके।
- सरकार एक्सपोर्टर से कारीगरों की मजदूरी बढ़वाए और कारीगरों को प्रोत्साहन राशि दिलाई जाए।
- हुनर हाट की तरह हस्तशिल्पियों के लिए भी बाजार की व्यवस्था हो।
- 50 वर्ष से अधिक उम्र वाले हस्तशिल्पियों को मास्टर ट्रेनर के रूप में नियुक्त कर मानदेय दिया जाए।