एलडीए के अधिशासी अभियंता अजय पंवार ने बताया कि अभी तक जो नियोजन प्रबंधनगर के लिए हुआ, उसे महायोजना 2021 के आधार पर तैयार किया गया। वहीं, महायोजना 2031 के लागू होने के बाद यहां लैंडयूज में काफी बदलाव हुआ।
सबसे बड़ा बदलाव ग्रीनबेल्ट के 80 प्रतिशत से अधिक तक कम हो जाने के रूप में हुआ है। पहले यहां एलडीए को 40 प्रतिशत से अधिक ग्रीनबेल्ट ही अर्जित होकर मिल रही थी। इसका आवासीय या व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता था।
किसी भी योजना में 15 प्रतिशत तक ग्रीनबेल्ट रखनी होती है। अब इस अनुपात के साथ योजना का विकास हो सकेगा। वहीं, एलडीए को भी विकास कार्य का खर्च निकालने के लिए भूखंडों की कीमतें नहीं बढ़ानी पड़ेंगी।
किसानों से भी वार्ता शुरू
एलडीए अधिकारियों ने बताया कि किसानों से भी लैंडपूलिंग पर वार्ता और समझौता पत्र भरवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। 2075 में से 1836 एकड़ जमीन किसानों से लेनी है। बाकी जमीन ग्राम सभा, नजूल आदि से एलडीए को यहां मिल जाएगी।
एलडीए 2006 में योजना शुरू करने के बाद तीसरी बाद इसके लिए ले-आउट बनाएगा। पूर्व वीसी सत्येंद्र सिंह ने एलडीए से एक ले-आउट प्रबंधनगर का वर्ल्ड पार्क व फॉर्म हाउस ग्रीनबेल्ट की जमीन पर बनवाने के निर्देश के बाद तैयार कराया था। हालांकि , मौजूदा अधिकारियों का कहना है कि आधिकारिक रूप से ऐसा कोई ले-आउट स्वीकृत नहीं हुआ। योजना शुरू होने के बाद बनी डीपीआर को भी एनजीटी खारिज कर चुका है।
दो साल में पूरा होगा योजना का विकास
जमीन अर्जित होने के बाद विकासकर्ता से काम शुरू कराया जाएगा। इसके दो साल में काम पूरा कर लिया जाएगा। किसान से जमीन लेने के दो साल बाद एलडीए किसान को 25 प्रतिशत विकसित जमीन वापस करेगा। इसके लिए किसान भी सहमति दे रहे हैं। - इंदुशेखर सिंह, मुख्य अभियंता, एलडीए