एलडीए अगर प्रबंध नगर योजना पर गंभीरता से काम करता तो 75 हजार परिवारों को आशियाना नसीब होता। लेकिन 12 साल बाद भी प्राधिकरण यहां काम नहीं कर पाया है। जबकि 203 करोड़ रुपये मुआवजे पर खर्च कर चुका है। यह मुआवजा जिला जज के यहां जमा है।
इस दौरान निजी बिल्डर यहां तेजी से अवैध कॉलोनियां बसाने में जुटे हैं। जबकि एलडीए जमीन अधिग्रहण में विधिक दिक्कतों का हवाला देकर चुपचाप बैठा है। एलडीए को हरदोई बाईपास पर आईआईएम के नजदीक करीब 1800 एकड़ जमीन में यह आवासीय योजना विकसित करनी है।
प्राधिकरण ने तीन गांवों की जमीन मुआवजा अवाॅर्ड कर आरक्षित भी कर ली। अधिकारियों की लापरवाही से जमीनों पर कब्जा नहीं लिया जा सका और छह साल तक मुआवजा प्रशासन के पास पड़ा रहा। इसके बाद 2014 में जिला जज के यहां चला गया।
इससे पहले 2013 में नई अधिग्रहण नीति आने के बाद किसानों ने दोबारा से मुआवजा तय करने की मांग शुरू की। जबकि अफसर पुरानी दरों पर ही मुआवजा देने पर अड़े रहे। इसके चलते करीब 50 याचिकाएं हाईकोर्ट में पड़ी हैं।