लखीमपुर खीरी की घटना के मद्देनजर आने वाले दिनों में प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण नजर आने लगे तो ताज्जुब नहीं है। कारण प्रदेश में भाजपा से अलग-अलग मुकाबिल विपक्ष की गोलबंदी की नई राह खुल सकती है। इस गोलबंदी में कांग्रेस को उन दलों की तरफ से तवज्जो मिल सकती है जो प्रदेश में हाशिए और सियासी तौर पर लगभग अप्रसांगिक सी मानी जाने लगी इस पार्टी को कोई महत्व ही नहीं दे रहे थे।
ओमप्रकाश राजभर, ओवैसी और शिवपाल जैसे नेता भी नए सिरे से रणनीति का तानाबाना बुनते दिखाई पड़ सकते हैं। वैसे तो अतीत में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा की बढ़त रोकने को कई प्रयोग असफल साबित हो चुके हैं। लखीमपुरखीरी की घटना से केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी का नाम और किसानों के जुड़ाव के चलते विपक्ष को भाजपा के खिलाफ इसे बड़ा मुद्दा बनाने का मौका तो मिल ही गया।
भाजपा ने इस मुद्दे पर विपक्ष की तरफ से सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों तथा उसके नेताओं की गतिविधियों को लेकर वोट की खातिर लोगों की संवेदनाओं पर सियासत करने का आरोप लगाया है। पर सभी को सियासत की इस कड़वी सच्चाई की जानकारी है कि सत्तारूढ़ दल की गलती या उसके खिलाफ जनआक्त्रसेश का सहारा लेकर विपक्ष हमेशा उसे सियासी अखाड़े में पटकनी देने की कोशिश करता है। भाजपा को कितना नुकसान होगा या नहीं होगा, यह तो समय बताएगा लेकिन उसकी चिंता और चुनौती बढ़ने से इन्कार नहीं किया जा सकता।
नए समीकरणों की संभावना
राजनीतिशास्त्री प्रो. एस.के. द्विवेदी कहते भी हैं कि विपक्ष के नेताओं को यह अच्छी तरह मालूम है कि वे अकेले भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए इस घटना से भाजपा को लेकर उपजी नाराजगी के सहारे अपनी सियासी कश्ती पार लगाने की खातिर वे नए सिरे से बातचीत कर सकते हैं। बशर्ते विपक्षी नेताओं की मुख्यमंत्री की कुर्सी और नेतृत्व को लेकर कोई सहमतिपूर्ण फार्मूला बन जाए। अलबत्ता इस पूरे घटनाक्त्रस्म के दौरान एक बात जरूर हुई है और वह है विपक्ष के बीच कांग्रेस की प्रासंगिकता बढ़ जाना।
कांग्रेस की बढ़त ने भी बढ़ाई गोलबंदी की संभावना
लखीमपुर खीरी घटना के चलते कांग्रेस का चर्चा के केंद्र में आना सत्तापक्ष से ज्यादा विपक्ष की चुनौती बनता दिख रहा है। हालांकि हाथरस से लेकर उम्भा तक प्रियंका गांधी का एक्शन लखीमपुर खीरी से अलग नहीं था लेकिन इस बार परिस्थितियों ने उन्हें विपक्षी दलों पर भारी कर दिया। लखीमपुर खीरी कूच की घोषणा तो अन्य दलों ने भी की लेकिन प्रियंका ज्यादा तेज निकलीं। विपक्ष के दूसरे दल जहां एलान पर अमल को सुबह का इंतजार ही करते रहे वहीं प्रियंका घटना वाली रात ही लखनऊ से लखीमपुर खीरी जाने वाली सड़क पर प्रशासन से तेवर के साथ भिड़ती नजर आईं।
रही-सही कसर पूरी कर दी उनकी गिरफ्तारी ने। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को जोरदार प्रदर्शन और गिरफ्तारी, बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र का एलान व स्थगन तथा प्रसपा प्रमुख शिवपाल सिंह यादव का प्रदर्शन व तेवर के साथ गिरफ्तारी, प्रियंका की चर्चा को दबा नहीं पाए। उधर, कांग्रेस के छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्यमंत्रियों सहित सचिन पायलट जैसे नेताओं को लखीमपुर भेजने के फैसले से भी इस मुद्दे पर कांग्रेस की तरफ लोगों का ध्यान बढ़ा दिया।
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर भी कहते हैं कि प्रियंका गांधी की सक्त्रिस्यता से तुरंत कोई बड़े परिवर्तन का दावा करना जल्दबाजी होगी लेकिन इसने उस कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में फोकस में लाकर बॉरगेनिंग की स्थिति में खड़ा कर दिया जिसको पूछना अभी तक कोई जरूरी नहीं समझता था।