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पालथी मारकर न बैठ पाएं तो हो सकते हैं इस बीमारी की चपेट में, गिरफ्त में बुजुर्ग से लेकर युवा तक

Tue, 21 May 2019 04:15 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
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बुजुर्ग से लेकर युवा तक गठिया रोग की गिरफ्त में हैं। तमाम मरीज ऐसे हैं, जो गठिया का इलाज कराते रहते हैं, लेकिन जांच में उन्हें कुछ और ही बीमारी निकलती हैं। दरअसल यह करीब 40 तरह की बीमारियों का एक समूह बन गया है। यह आनुवांशिक भी होती है और कुष्ठ से संबंधित भी।

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इसमें आर्थराइटिस जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन उसमें ज्यादातर बीमारियां आटो इम्युनिटी की वजह से होती हैं। टीबी की वजह से भी आर्थराइटिस जैसे लक्षण दिख रहे हैं। यदि पीठ में टीबी की वजह से कोई गांठ है तो संभव है कि पैर में आर्थराइटिस जैसे लक्षण दिखें।

ऐसी स्थिति में इसकी पहचान मुश्किल है। लेकिन केजीएमयू में विभिन्न तरह की जांचें होने की वजह से बीमारी पकड़ में आ जाती है। जीवनशैली में बदलाव लाने से इस बीमारी से बचा जा सकता है। यदि बीमारी हो गई है तो भी खानपान, योग व ध्यान से इसे काबू में रखा जा सकता है।
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भरपूर विटामिन सी व डी युक्त खाद्य पदार्थ का प्रयोग करने और सूर्य नमस्कार, प्राणायाम के साथ नियमित तौर पर दवाएं लेते रहने से यह बीमारी खत्म हो जाती है। वजन पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। गठिया रोग, इसकेविभिन्न प्रकार और बचावों को लेकर गठिया रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनुपम वाखलु से बातचीत की गई। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

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जानें- क्या है गठिया की बीमारी

डॉ अनुपम बाखलु - फोटो : अमर उजाला
क्या है गठिया की बीमारी
गठिया एक जटिल बीमारी है। यह करीब 40 तरह की होती है। इसका कुष्ठ समेत तमाम ऑटो इम्यूनल बीमारियों से गहरा नाता है। इन दिनों ज्यादातर ऐसी बीमारियां सामने आ रही हैं, जिसे शुरुआती दौर में सिर्फ गठिया माना जाता है। लेकिन जांच में अलग-अलग बीमारियां सामने आती हैं।

यदि सिर्फ आर्थराइटिस की बात करें तो इसमें जोड़ों में जकड़न आ जाती है। जोड़ों से आवाज आती है। पीड़ित चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है। हाथ, पैर या अंगुलियां टेढ़ी होने लगती हैं। पलथी मारकर बैठने में असमर्थ हो जाता है। रूमेटाइटड आर्थराइटिस में सुबह के वक्त ज्यादा दर्द होता है।

चलने फिरने के बाद आराम मिलता है। सर्दी के मौसम में भी तकलीफ बढ़ जाती है। प्राथमिक लक्षण के आधार पर इलाज शुरू कर दिया जाए तो इसे पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। हालांकि मरीजों के साथ चिकित्सकों में भी जागरूकता आ रही है। अब चिकित्सक गठिया का उपचार शुरू करते हैं। आराम न मिलने पर रेफर कर देते हैं और जांच में बीमारी पकड़ में आ जाती है। तत्काल इलाज शुरू कर देने से इस पर नियंत्रण हो जाता है।

 

बीमारियों का है समूह

प्रोफेसर अनुपम वाखलु - फोटो : अमर उजाला
इसके होने की वजह क्या है?
जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं। यह बीमारियों का समूह है। सभी के अलग-अलग कारण हैं। लेकिन प्राथमिक तौर पर प्रदूषण, खानपान की गलत आदतों की वजह से यह बीमारी होती है। हड्डियों में कैल्शियम व जरूरी खनिज पदार्थ के कम होने से हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है।

इस तरह देखा जाए तो गठिया होने की वजह तमाम हैं। कुछ इम्युनल सिस्टम की वजह से होते हैं तो कुछ आराम तलबी, मादक पदार्थों का सेवन, पौष्टिक तत्वों की कमी से। कुछ मामले आनुवांशिक भी होते हैं। इस रोग में प्यूरिन नामक प्रोटीन के मेटाबोलिज्म की विकृति होती है।

यूरिक एसिड की वृद्धि भी एक वजह है। यह हाथ, पैर, अंगुली सहित शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करता है। एक डाटा के मुताबिक, अकेले घुटने की आर्थराइटिस से पीड़ित लगभग 30 प्रतिशत रोगी 45 से 50 साल की उम्र वाले हैं। जबकि 18 से 20 प्रतिशत रोगी 35 से 45 साल के हैं।

सूर्य नमस्कार बेहतरीन व्यायाम

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जीवनशैली में सुधार लाएं
गठिया के मरीजों को विटामिन सी और डी का खासतौर से ध्यान रखना पड़ता है। विटामिन डी वाली सब्जियों एवं फल का नियमित और भरपूर प्रयोग करना चाहिेए। इसी तरह पुराने जौ, गेंहू आदि का प्रयोग करना चाहिए। डेयरी उत्पादों, संतरे का रस, दूध और अनाज आदि विटामिन डी की कमी को पूरा करते हैं।

एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों की वजह से जैतून का तेल भी फायदेमंद होता है। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो से बचना चाहिए।  शरीर में अधिक वसा जमा नहीं होने देना चाहिए। शुद्ध पानी पीएं। कॉफी के बजाय हर्बल चाय लें। जूस का प्रयोग करें। खाने में नमक की मात्रा कम कर दें। साथ ही कैल्शियम सप्लीमेंट का अतिरिक्त डोज लेना पड़ता है।

गठिया में व्यायाम के तौर पर क्या करें
इसमें सूर्य नमस्कार सबसे बेहतरीन व्यायाम है। कुछ लोगों को प्राणायाम की भी सलाह दी जाती है, लेकिन कपालभांति मना किया जाता है। ज्यादातर एक ही स्थिति में बैठे नहीं रहना चाहिए। इससे जॉइंट्स जाम होने लगते हैं। धूप में कुछ देर टहलना जरूरी है।

गठिया में दवाएं लंबे समय तक लेनी होती है। बीच में दवाएं नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि इसकी रिकवरी धीरे-धीरे होती है। दवाएं छोड़ देने से समस्या फिर से बढ़ने लगती है।

देखें- गठिया और कुष्ठ का संबंध

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गठिया और कुष्ठ का क्या संबंध है।
कई बार बाहरी तौर पर कुष्ठ और गठिया केलक्षण एक जैसे होते हैं। लेकिन जब कुष्ठ होता है तो उसमें जोड़ों में दर्द, सूजन के साथ ही नसें मोटी हो जाती हैं। शरीर में कुछ चकत्ते दिखते हैं, जो सुन्न से रहते हैं। लेकिन इनका पूरी तरह से इलाज संभव है। यह छूने पर नहीं फैलता है। इसलिए घबराने के बजाय इलाज कराना चाहिए।

कुष्ठ एक व्यक्ति को है तो क्या वह दूसरों को भी हो सकता है
 कोई जरूरी नहीं है। फिर भी परिवार में एक सदस्य को होता है तो अन्य सदस्यों की भी जांच की जा सकती है। साथ बैठने, खाना खाने, बिस्तर पर सोने, तौलिया का प्रयोग करने से यह नहीं फैलता है। इसका इलाज शुरू कर दिया जाए तो कुछ समय में बीमारी दूर हो जाती है। इतना जरूर है कि इसका इलाज लंबा चलता है। कई मरीजों में दो से ढाई साल तक इलाज करना होता है।
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देखें- केजीएमयू में सहूलियतें

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टीबी होने से भी गठिया होता है?
टीबी के साथ भी गठिया हो सकता है। यदि शरीर के किसी हिस्से में टीबी है तो दूसरे हिस्से में सूजन आ जाती है। उसका स्वरूप और असर पूरी तरह से गठिया जैसा ही होता है। लेकिन इलाज एकदम अलग तरीके से किया जाता है।

बीमारी से बचाव कैसे
गठिया या कुष्ठ जैसी बीमारी में सबसे जरूरी है नशे से दूरी बनाना। शराब, तंबाकू या तंबाकू से बनी किसी भी चीज का सेवन जहर केसमान है। इससे बीमारी घटने के बजाय बढ़ती है। यदि दवाओं के साथ इनका सेवन जारी रहा तो दवाएं काम नहीं करती हैं।

केजीएमयू में क्या सहूलियतें हैं
यहां गठिया और इससे जुड़ी आटॅो इम्यूनल डिजीज से संबंधित सभी बीमारियों का इलाज किया जाता है। विभाग में हर तरह की डिजीज के लिए स्पेशल लैब है। खास बात यह है कि यहां तीन गुने सस्ती दर पर जांचें की जाती है। उदाहरण के तौर पर ईएनओ जांच बाजार में सात हजार में होती है, लेकिन विभाग की लैब में 1500 में हो जाती है। इसी तरह अन्य जांचें भी सस्ती दर पर उपलब्ध हैं।
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