किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में इलाज के दौरान मरीजों की मौत के साथ ही उनके मरने का राज भी दफन हो रहा है।
चाहे क्वीन मेरी में डॉक्टरों की लापरवाही से आए दिन दम तोड़ रहीं प्रसूताएं हो या फिर मेडिसिन या सर्जरी विभाग में मरने वाले अन्य मरीज। यहां किसी की भी मौत के कारण का पता नहीं चलता।
न ही केजीएमयू प्रशासन इन पर पड़ा पर्दा उठाना चाहता है। अलबत्ता हर मौत के बाद संबंधित विभाग के हेड दोषियों को बचाने की कोशिश में जुट जा रहे हैं।
जबकि नियमत: इन मौतों के कारणों का पता लगाने के लिए एक कमेटी गठित होनी चाहिए, जिससे मरीजों की लगातार हो रही मौतों के पीछे के सच को जाना जा सके।
पिछले आठ दिनों में केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग क्वीन मेरी में बलरामपुर की मथुरा बाजार निवासी गर्भवती निशा देवी (27) हो या फिर बाराबंकी के जहांगीराबाद निवासी राज कुमार की पत्नी मीरा (32)।
दोनों की ही सीजेरियन प्रसव के दौरान हालत बिगड़ी और उन्हें वेंटीलेटर यूनिट भेज दिया गया। इसके बावजूद दोनों की मौत हो गई।
इसके बाद एसजीपीजीआई के पास स्थित सभाखेड़ा निवासी सुंदर की पत्नी रेशमा (20) और उसके गर्भ में पल रहे शिशु की भी क्वीन मेरी में मौत हो गई।
इससे पहले आईसीयू में रानीगंज प्रतापगढ़ निवासी धर्मा देवी ने भी दम तोड़ दिया था।
केजीएमयू प्रशासन ने विशेष सचिव चिकित्सा शिक्षा अरिंदम भट्टाचार्या के पहुंचने पर आननफानन में निशा देवी और मीरा की मौत का कारण हीमोग्लोबिन की कमी करार दिया।
गोरखपुर की नीलम (28) को छह दिन पहले क्वीन मेरी अस्पताल में पेट दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 30 मई को हालत गंभीर होने पर उसे ट्रॉमा सेंटर के लिए रेफर कर दिया।
ट्रॉमा सेंटर पहुंचे तो डॉक्टरों ने बिना इलाज दिए ही उसे वापस कर दिया। जबकि परिवारीजन नीलम को लेकर वापस क्वीन मेरी पहुंचे लेकिन उसने गेट पर दम तोड़ दिया।
पति सरोज का आरोप था कि छह दिन तक भर्ती रहने के बावजूद इलाज में देरी की गई। इससे नीलम की मौत हो गई।
डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाने पर नीलम का पोस्टमार्टम कराने की धमकी देकर सभी को चुप करा दिया गया।
डेथ ऑडिट से अस्पताल में भर्ती के समय मरीज की स्थिति, इलाज के लिए क्या सलाह दी गई, मरीज के अस्पताल में भर्ती रहने का समय, उस दौरान इलाज और मौत का कारण का आकलन भी इस दौरान होता है।
इससे पता चलता है कि संस्थान में इलाज के संसाधन अपर्याप्त तो नहीं है।
उसके इलाज में जरूरी नर्स, वार्ड ब्वॉय, जांच के उपकरणों, बीमारी के इलाज के लिए योग्य चिकित्सक की कमी का भी इस ऑडिट में पता चल जाता है।