कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि बाबरी ढांचे को कोई नुकसान नहीं होने देंगे। लेकिन 6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने ढांचा गिरा दिया। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में कल्याण सिंह के खिलाफ अवमानना की अर्जी दाखिल की गई। ये अर्जी दाखिल की थी मोहम्मद असलम नाम के आदमी ने। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की सुनवाई की और फिर 24 अक्टूबर, 1994 को फैसला दिया। कोर्ट ने कहा- ‘अदालत की अवमानना ने देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को प्रभावित किया है, इसलिए मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को सांकेतिक तौर पर एक दिन के लिए जेल भेजा जा रहा है। साथ ही 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया जा रहा है।’
कोर्ट के इस आदेश के बाद कल्याण सिंह को एक दिन के लिए तिहाड़ जेल भेजा जाना था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार एलसी भादू ने दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी एचपीएस वर्क को बुलाया और कोर्ट के आदेश की तामील करने को कहा। लेकिन ये डीसीपी एचपीएस वर्क के अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला था। फिर तिलक मार्ग थाने के एसएचओ को बुलाया गया और कोर्ट का आदेश तामील करने को कहा गया। तिलक मार्ग थाने के एसएचओ सुरक्षा के तामझाम के साथ कॉपरनिकस मार्ग पर बने यूपी भवन पहुंचे और वहां से कल्याण सिंह को लेकर तिहाड़ जेल के लिए निकले। उस वक्त तिहाड़ जेल की सुपरिटेंडेंट थीं किरण बेदी। किरण बेदी ये जानना चाहती थीं कि कल्याण सिंह को एक दिन की जेल का मतलब क्या है। यानी कि उन्हें किस वक्त से किस वक्त तक जेल में रखना है। किरण बेदी इस बात की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से करना चाहती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया-‘किरण बेदी, आपको अपने सवाल के जवाब के लिए जेल का मैन्युअल देखना चाहिए’
और फिर कल्याण सिंह को एक दिन के लिए जेल में रखा गया, जो एक सांकेतिक सजा थी।