राजनीतिशास्त्री प्रो. रजनी कोठारी ने ‘जाति और भारतीय राजनीति’ का विश्लेषण करते हुए लिखा है- जो लोग राजनीति में जातिवाद की शिकायत करते हैं, वे न तो राजनीति का प्राकृत स्वरूप समझ पाए हैं और न जाति के स्वरूप को। भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है। अत: न चाहते हुए भी राजनीति को जाति संस्था का उपयोग करना पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि शायद यह कांग्रेस का आजादी की लड़ाई से जुड़ा होना ही वह कारण रहा होगा, जिससे स्वाधीनता मिलने के बाद के शुरुआती चुनावों में लोग कांग्रेस के साथ रहे, लेकिन समय बीतने के साथ लोगों की आकांक्षाएं बढ़ीं। अस्मिता का भाव पैदा हुआ। भिन्न चेतनाओं ने सोशलिस्ट, जनसंघ एवं अन्य नाम के राजनीतिक घटकों को जन्म दिया। जयनारायण पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के डेवलपमेंट स्टडीज की विशेषज्ञ डॉ. भारती पांडेय कहती हैं,बहुमत मिलने पर ही किसी भी राजनीतिक दल को सरकार बनाने की ताकत मिलती है। इसलिए सामाजिक रूप से कमजोर तबकों ने अपनी सियासी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जातीय गोलबंदी शुरू की। जिसे चंद्रभानु गुप्त सरकार से अलग होने के बाद चौधरी चरण सिंह ने रफ्तार दे दी।
हिंदुत्व व अति पिछड़ों की गोलबंदी से भाजपा को मिली ताकत
प्रो. एपी तिवारी कहते हैं, वजह चाहे 1991 में अयोध्या आंदोलन एवं कल्याण सिंह जैसे अति पिछड़े चेहरे का भाजपा का नेता होना रहा हो, हिंदुत्व ने ‘अजगर’ फॉर्मूले को तोड़ दिया। पिछड़ों में सबसे अधिक आबादी वाले यादव, जातीय अस्मिता के कारण मुलायम सिंह से जुड़े तो मुस्लिम भी भाजपा को हराने या मस्जिद बचाने के नाम पर यादवों के साथ मुलायम के पक्ष में खड़ा हो गया। पश्चिम में जाट एवं गुर्जर ने हिंदुत्व के नाम पर भाजपा का साथ दिया। राजपूत भी हिंदुत्व के नाम पर भाजपा के पक्ष में आए। यह बात अलग है कि भाजपा इन्हें अपने साथ स्थायी रूप से जोड़कर नहीं रख पाई। इसके अलग कारण हैं। पर, 2014 में बतौर भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने फिर से इन्हें लामबंद किया। इनमें पश्चिम में 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के कारण पश्चिम में जाट एवं गुर्जरों का मुस्लिमों से छिटक जाना भी बड़ा कारण रहा।
‘अजगर’ का फॉर्मूला कारगर साबित हुआ
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी बताते हैं, गैर मुस्लिम पिछड़ी जातियों में 27-30 प्रतिशत आबादी अति पिछड़ी जातियों की मानी जाती है।
- वर्ष 2017 से पहले तक मुस्लिम पिछड़ी जातियां एक तरह से गैर कांग्रेसवाद की राजनीति करने सोशलिस्ट पार्टियों जैसे संगठनों के साथ पूरी ताकत से साथ रहीं या उन्होंने अपने बीच से निकले कांग्रेस के नेताओं को वोट देकर उन्हें मजबूत किया। शुरू में पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा जनसंघ का भी समर्थक रहा।
- चौधरी चरण सिंह के कांग्रेस से अलग होने के बाद ‘अजगर’ के नाम पर राजनीतिक ताकत पाने की अभिलाषा में ताकतवर या आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत समृद्ध अहीर, जाट, गुर्जर जैसी हिंदू पिछड़ी जातियां उनके और रामसेवक यादव जैसे चेहरों के साथ सोशलिस्टों की तरफ झुकीं। कुछ अपवादों को छोड़कर।
जनसंघ ने भी एकजुटता बढ़ाकर तलाशी थी ताकत
- जनसंघ ने आर्थिक रूप से कमजोर यानी गरीब मानी जाने वाली लोध, तेली, भुर्जी, मौर्य जैसी अति पिछडी जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद करने की राह दिखाई। इन्हें कंठीधारी जातियां भी कहा जाता है। मतलब, धार्मिक रूप हिंदू परंपराओं एवं आस्था का ज्यादा दृढ़ता से पालन करने वाली जातियां।
- स्थानीय स्तर पर जमीन और खेती-किसानी की प्रतिस्पर्धा ने कुर्मियों को भी जनसंघ के साथ जोड़ा। शायद यही वह वजह थी जिसने जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष पर हिम्मत सिंह लोधी को कई साल तक बरकरार रखा। हिम्मत सिंह, कल्याण सिंह के राजनीतिक गुरु भी थे।
90 के दशक में हिंदुत्व की राजनीति के सहारे अपने दम पर सरकार बनाने लायक राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए संघ परिवार के अयोध्या आंदोलन के दौरान घटे घटनाक्रम ने पिछड़ी जातियों की सियासी लामबंदी की नींव रख दी। हिंदुत्व के उभार और इससे भाजपा को मिल रहे राजनीतिक लाभ की काट के लिए वर्ष 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी। इसके समर्थन एवं विरोध ने देश के साथ प्रदेश में भी सियासत को अगड़ा बनाम पिछड़ा कर दिया।
...और जातियों की गोलबंदी से उखड़ गए कांग्रेस के पैर
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं, हालांकि भाजपा ने कल्याण सिंह जैसे पिछड़े नेता के नेतृत्व में चुनाव लड़कर अति पिछड़ी जातियों की अगड़ी जातियों के साथ लामबंदी मजबूत करने में कामयाबी हासिल कर 1991 में सत्ता हासिल कर ली। केंद्र में भी भाजपा मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी। अयोध्या आंदोलन के दौरान कल्याण सिंह एवं मुलायम सिंह यादव के रूप में मजबूती से उभरे पिछड़ी जाति के इन दो नेताओं के चलते प्रदेश की राजनीति में पिछड़ी जातियों की ऐसी गोलबंदी हुई कि कांग्रेस के पैर ही उखड़ गए।
पिछड़े हुए निराश तो भाजपा को वनवास
पिछड़ों की बदलती गोलबंदी खासतौर से अति पिछड़ी जातियों का समर्थन भाजपा सरकार की मंदिर पर बदलते रवैये से सामान्य जातियों में व्याप्त नाराजगी ने 2007 में बसपा एवं 2012 में सपा की सरकारें बनवाई। पर, 2013 में नरेंद्र मोदी के रूप में जिनके चेहरे पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कुछ कारणों से हिंदुत्व का रंग चढ़ चुका था, उनके भाजपा की केंद्रीय राजनीति में प्रवेश ने कई कारणों से गैर यादव पिछड़ी जातियों एवं गैर जाटव दलित जातियों की उनके साथ गोलबंदी ने देश एवं प्रदेश में भाजपा के कमल को फिर खिला दिया।
भाजपा के 113 सांसद ओबीसी
पीएम मोदी ने 2020 में कई जगह बताया कि लोकसभा में भाजपा के सांसदों में 113 ओबीसी, 53 एससी एवं 43 एसटी हैं। देखा जाए तो भाजपा सांसदों में 37.2 प्रतिशत ओबीसी, 17.4 प्रतिशत एससी और 14.1 प्रतिशत एसटी हैं। सुरक्षित सीटों को छोड़ दिया जाए तब भी सामान्य सीटों पर भाजपा के 60 प्रतिशत सांसद गैर उच्च जाति के हैं। इनमें से 50 प्रतिशत (113) ओबीसी वर्ग से हैं। जाति के लिहाज से भाजपा सामाजिक तौर पर सबसे बड़ी प्रतिनिधित्व वाली पार्टी है। इस प्रक्रिया में उसने अपनी उच्च जाति वाली प्रभुता को कम किया है। हालांकि, सोशल इंजीनियरिंग से उसने उच्च जातियों के समर्थन को खोने नहीं दिया।
स्रोत : ‘द न्यू बीजेपी : मोदी एंड द मेकिंग ऑफ वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पार्टी’ वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजशास्त्री नलिन मेहता की आने वाली पुस्तक से।
पर...उम्मीद के मुताबिक लाभ नहीं मिला तो सपा से खिसकने लगे अति पिछड़े, मोदी के कारण इनका झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा। राजनीतिक संरचना में ताकतवर पिछड़ी जातियों ने ही 2007 में बसपा और 2012 में सपा को भी पूर्ण बहुमत से सत्ता दिलाई। लोकनीति-सीएसडीएस की रिपोर्टें भी यही बताती हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2012 में सपा सरकार बनने के बाद सत्ता की योजनाओं का ज्यादा लाभ यादवों को मिला। नतीजा, अति पिछड़ी जातियां सपा से छिटकने लगीं। यही वजह थी कि 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 20 प्रतिशत से कम वोट हासिल करने वाली भाजपा को 2014 में तीन गुना ज्यादा वोट हासिल हुए।
समाजशास्त्री एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डीआर साहू इसे और स्पष्ट करते हैं। कहते हैं, 2014 में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनने की एक वजह जहां कांग्रेस सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे का आंदोलन था वहीं दूसरी ओर भाजपा द्वारा अति पिछड़ी जाति के नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भी था।
अति पिछड़ी जातियों को लगा कि उनके बीच का आदमी केंद्र की सत्ता संभालेगा। लिहाजा जातीय स्वाभिमान की चेतना एवं आकांक्षा पूरी होने के आकर्षण ने भाजपा के पक्ष में अति पिछड़ों की लामबंदी कर दी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी केंद्र में मोदी के होने का फायदा मिला तो प्रदेश में केशव मौर्य के रूप में अति पिछड़ी जाति से आने वाले चेहरे के भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष होने का भी पार्टी को लाभ मिला।
हिंदुत्व की चेतना और लोगों की आकांक्षाओं से बदले समीकरण
मोदी जब भाजपा की केंद्रीय राजनीति में आए तो उनके पास हिंदुत्वादी राजनीति का चेहरा होने के साथ ही गुजरात के विकास का मॉडल भी था। प्रो. डीआर साहू कहते हैं,मोदी के नाम पर हिंदुत्व की चेतना के साथ लोगों की आकांक्षाओं का ऐसा तालमेल बैठा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली लगातार 10 साल चल चुकी डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चली। भाजपा ने चुनाव जीतकर सरकार बना ली।
वर्ष 2013 और 2014 के भाजपा के चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो प्रो. साहू की बात एकदम स्पष्ट हो जाती है। मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह खुद को गरीबों एवं अति पिछड़ों के आर्थिक सशक्तीकरण एवं कल्याण के लिए काम करने का प्रतीक बनाया। वह हिंदुत्व के नाम पर अगड़ों, अपवाद छोड़कर अधिकतर गैर यादव पिछड़ों एवं गैर जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने में सफल रहे। मोदी ने सत्ता संभाली तो उन्होंने अति पिछड़ी जातियों के लिए कई योजनाएं शुरू कीं तो दूसरी तरफ इन जातियों की सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ाई। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार ग्रामीण पिछड़ी जातियों में 22.67 फीसदी एवं शहरों में रहने वाली पिछड़ी जातियों में 15.47 प्रतिशत गरीब हैं।
अति पिछड़ी जातियां आजादी के आंदोलन से ही राष्ट्रवादी चेतना के साथ रही हैं। पीएम मोदी के भाजपा का नेतृत्व संभालने के बाद इन जातियों की राष्ट्रवादी चेतना को बल मिला है। साथ ही अन्य दलों द्वारा किए गए सौतेले व्यवहार से मुक्ति मिली है। सम्मान से इनका आत्मगौरव बढ़ा है। यह ज्यादा ताकत से भाजपा के साथ हैं। -केशव प्रसाद मौर्य, उप मुख्यमंत्री
ताकत ऐसी... : प्रदेश में सभी प्रमुख दलों के मुखिया पिछड़ी जातियों के
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव कुर्मी हैं। सपा पिछड़ों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले यादव वोटों के आधार वाली पार्टी है, लेकिन उसके प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम भी कुर्मी ही हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी अति पिछड़ी जाति के हैं। अनुसूचित जाति की गोलबंदी से राजनीति में कदम रखने वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी भीम राजभर के रूप में अपना प्रदेश का नेतृत्व अति पिछड़ी जाति को सौंप रखा है। हालांकि समाजशास्त्रियों का निष्कर्ष है कि प्रियंका गांधी के नारी अस्मिता के सवाल एवं इनके स्वाभिमान को धार देने और अखिलेश का इस बार अति पिछड़ी जातियों के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश ने समीकरण बदले हैं। क्या कुछ होगा, यह तो आगे पता चलेगा, पर इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि पिछड़ों की गोलबंदी चुनावी राजनीति में जीत हासिल करने का प्रमुख जरिया बन चुकी है।
बढ़ी सियासी चेतना तो कई दलों ने लिया आकार
पिछड़ी जातियों में तेजी से फैल रही सियासी चेतना और गोलबंदी का प्रमाण प्रदेश में गठित अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी, जनवादी समाजवादी जैसे दल हैं। कांशीराम का शुरुआती सपना भले ही बामसेफ और डीएस 4 जैसे संगठनों के जरिये अनुसूचित जाति को लामबंद करके इन जातियों की चेतना को सियासी मुकाम देने का रहा होगा, लेकिन बाद में उन्होंने भी बड़ी ताकत बनने के लिए पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने के लिए इनका नेतृत्व उभारा था। जिसमें रामलखन वर्मा, सोनेलाल पटेल, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, सुखदेव राजभर, रामअचल राजभर, जंगबहादुर पटेल जैसे पिछड़े वर्ग के कई चेहरे थे। बसपा ने भाईचारा सम्मेलन करके पिछड़ी व अगड़ी जातियों की अनुसूचित जातियों के साथ लामबंदी मजबूत कर सियासी समीकरण दुरुस्त किए। जिससे 2007 में बसपा की प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।
2022 में ओमप्रकाश राजभर व संजय निषाद भी परखे जाएंगे
विधानसभा चुनाव 2022 की बाजी जीतने के लिए भी भाजपा हिंदुत्व एवं विकास के साथ पिछड़ों एवं दलितों की गोलबंदी मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रही रही है। पर, इस बार राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव भी दिख रहा है। भाजपा से मुकाबले को मैदान में खड़े दूसरे दल भी पिछड़ों की गोलबंदी की कोशिश कर रहे हैं। इसका उदाहरण सपा का ओमप्रकाश राजभर से गठबंधन तथा बसपा के कुर्मी चेहरे लालजी वर्मा तथा अति पिछड़े चेहरे राम अचल राजभर को सपा में शामिल करना है। भाजपा ने भी पहले केंद्र में फिर प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार के साथ विधान परिषद को राज्यसभा के उम्मीदवारों के चयन पिछड़ों को महत्व का संदेश दिया है। हाल ही संजय निषाद के साथ गठबंधन भी एक उदाहरण है।