विवेक तिवारी की हत्या के आरोपी प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार वर्ष 2016 बैच के सिपाही हैं। दोनों हमउम्र सिपाहियों में दोस्ताना संबंध थे। मुंशी उनकी एकसाथ ड्यूटी लगाता था और थानेदार ने कभी आपत्ति नहीं की। पूर्व पुलिस महानिदेशक अरविंद कुमार जैन बताते हैं कि नए व पुराने सिपाहियों की टीम बनाकर गश्त, पिकेट व मुल्जिम ड्यूटी लगाने की व्यवस्था थी।
माना जाता था कि ड्यूटी में कोई समस्या आने पर पुराना आरक्षी अपने अनुभव और नया सिपाही अपनी चुस्ती-फुर्ती का इस्तेमाल करेगा। दोनों में दोस्ताना संबंध बनने के कम आसार रहते थे। नया सिपाही वरिष्ठ का लिहाज करके शराब पीने या अन्य खुराफात की हिम्मत नहीं जुटा पाता था और पुराना सिपाही भी नए सिपाही की मौजूदगी में कुछ गलत करने से संकोच करता था।
थानेदार भी सिपाहियों की ड्यूटी की सूची को संजीदगी से पढ़ने के बाद स्वीकृति प्रदान करता था। ड्यूटी पर रवाना हो रहे पुलिसकर्मियों को टिप्स देता था। पूर्व पुलिस महानिदेशक का मानना है कि आरक्षी प्रशांत और संदीप की एक साथ ड्यूटी लगाने के बजाय दोनों को वरिष्ठ आरक्षी के साथ अलग-अलग इलाके में गश्त का जिम्मा सौंपा जाता तो शायद यह फजीहत न होती। तय है कि नया सिपाही यदि कार में बैठे जोड़े की ओर बढ़ता तो पुराना सिपाही उसे रोक देता।
पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण और विभिन्न पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों पर तैनात रहे सेवानिवृत्त आईपीएस अरविंद कुमार जैन ने बताया कि प्रदेशभर के प्रशिक्षण संस्थानों की क्षमता 18-22 हजार है। इनमें सिपाहियों को एक साल के प्रशिक्षण की व्यवस्था थी। सर्दी, गर्मी और बरसात के मौसम में ड्यूटी का प्रशिक्षण प्राप्त करके थानों में पहुंचे सिपाही को बेसिक पुलिसिंग का अभ्यास कराया जाता था।
पूरे साल में छह महीने परेड कराकर आदेश मानने की आदत डाल दी जाती थी। इसके अलावा कानूनी पढ़ाई, नैतिकता, अनुशासन, खेलकूद, शस्त्र प्रशिक्षण व पुलिस के अन्य कार्यों की गहन जानकारी दी जाती थी। पुलिसकर्मियों को विभिन्न मुद्दों पर जानकारी के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के लोग बाकायदा क्लास लेते थे।
नियमित रूप से भर्ती न होने से पुलिसकर्मियों की कमी हुई तो एकमुश्त 40-50 हजार आरक्षियों की भर्ती के साथ प्रशिक्षण की अवधि घटाकर छह महीने कर दी गई। क्षमता से दो-ढाई गुना अधिक प्रशिक्षु होने से प्रशिक्षण केंद्रों के कक्ष कम पड़ने लगे। पेड़ व बरामदे में प्रशिक्षण की खानापूरी होने लगी। सिपाही को न कानूनी जानकारी मिल रही, न ही नैतिकता व अनुशासन का पाठ पढ़ रहे हैं।
हालात यह है कि प्रशिक्षु सिपाहियों को संवेदनशील स्थानों पर कानून व्यवस्था ड्यूटी पर भेजने में अफसर हिचक नहीं करते। थाने में नए सिपाहियों को कुछ सिखाने के बजाय उनसे ड्यूटी लेनी शुरू कर दी जाती है।
तीन साल पहले पुलिस महानिदेशक के पद पर तैनाती के दौरान अरविंद कुमार जैन ने प्रदेश के सभी थानेदारों को रोजाना थाने के चार रजिस्टर जांचने के आदेश दिए थे। इनमें सिपाहियों की बीट सूचना व ड्यूटी रजिस्टर प्रमुख थे। इसके अलावा थानेदार को तबादला होने पर गोपनीय पुस्तिका में इलाके की अहम जानकारी दर्ज करने के आदेश थे।
वक्त बीतने के साथ थानेदारों ने लापरवाही शुरू कर दी। क्षेत्राधिकारी व अन्य अधिकारी भी गहन पर्यवेक्षण कर अंकुश लगाने की कोशिश नहीं करते। विगत दिनों राजधानी के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें पर्यवेक्षण अधिकारी ने पुलिस के खेल पर अंकुश लगाने के बजाय थानेदार से दोस्ती निभाई।