सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह
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यूपी, असम पुलिस और बीएसएफ के चीफ रह चुके सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह हरियाणा के जाट आरक्षण आंदोलन में सिविल व पुलिस अधिकारियों की चूक पर जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद चर्चा में हैं। उनकी रिपोर्ट के आधार पर कई अफसर निलंबित किए जा चुके हैं। वह सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के 10 साल बाद भी पुलिस रिफॉर्म्स लागू न करने को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं।
कहते हैं, यदि पुलिस सुधार हुए होते तो जाट आरक्षण आंदोलन के समय हरियाणा पुलिस बेबस, लाचार और अक्षम नजर नहीं आती।
हरियाणा पुलिस ही क्यों, यूपी व अन्य राज्यों की पुलिस भी इतनी खोखली हो चुकी है कि गंभीर चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं है। यूपी में तो पुलिस का इकबाल और खौफ खत्म हो गया है।
पद पर बने रहने और पैसा कमाने के लिए पुलिस अधिकारी अपनी आत्मा बेच रहे हैं। राजधानी आए प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह से ‘अमर उजाला’ ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की, पेश है प्रमुख अंश।
'सरकारें महीनों तक रिपोर्ट दबाए बैठी रहती हैं'
सवाल - हरियाणा में जाट आंदोलन में पुलिस व प्रशासनिक चूक पर आपकी रिपोर्ट के बाद कई अधिकारी निलंबित हुए हैं, आप कितने संतुष्ट हैं?
जवाब- हमने 13 मई को सरकार को रिपोर्ट सौंपी और 20 मई को कुछ अफसरों को निलंबित कर दिया गया। एक हफ्ते में कार्रवाई किया जाना संतोषजनक है। वर्ना, सरकारें महीनों तक रिपोर्ट दबाए बैठी रहती हैं।
सवाल - आपने कहा है कि हरियाणा पुलिस गंभीर चुनौती से निपटने में सक्षम नहीं है, इसकी वजह?
जवाब- देखिए, हरियाणा के लोग अच्छे हैं। फिजिकली फिट हैं लेकिन हरियाणा पुलिस को सही प्रशिक्षण नहीं मिला। वहां की आर्म्ड पुलिस नेतृत्व विहीन है, उसमें बटालियन कल्चर नहीं है। उसे सही ट्रेनिंग, अच्छे इक्विपमेंट की जरूरत है। नए डीजीपी इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं।
सवाल - क्या जांच के दौरान किसी दबाव का सामना करना पड़ा?
जवाब- हां, कुछ अधिकारी राजनीतिक पैंतरेबाजी में जुटे थे। उन्होंने बड़े लोगों से सांकेतिक या स्पष्ट रूप से दबाव बनवाने की कोशिश की। हालांकि धमकी किसी ने नहीं दी। हमने कायदे से उनकी बात सुनी और अनसुनी कर दी।
'अधिकतर राज्यों में पुलिस हो चुकी है खोखली'
सवाल - यूपी पुलिस को गंभीर चुनौतियों से निपटने में कितना सक्षम पाते हैं ?
जवाब - यूपी ही नहीं, अधिकतर राज्यों में पुलिस खोखली हो चुकी है। चुनौतियों का सामना करने में अक्षम है। मुजफ्फरनगर दंगे को ही देख लीजिए, पुलिस का रवैया विवादास्पद रहा। हरियाणा में अभी हम देख चुके हैं। यूपी में तो हर हफ्ते पुलिस के पिटने की घटनाएं हो रही हैं। सपा सरकार के कार्यकाल में पुलिस की जितनी पिटाई हुई है, उतनी पहले कभी नहीं हुई।
सवाल - इसकी क्या वजह मानते हैं?
जवाब- इसके दो पहलू हैं। पहला, पुलिस का काम इतना खराब है कि जनता उसे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। दूसरा, आपराधिक तत्व पुलिस पर हावी हो गए हैं। उनके दिमाग से पुलिस का इकबाल और खौफ निकल गया है। राजनीति और अपराधियों के गठजोड़ से यह स्थिति पैदा हुई है।
'पुलिस का राजनीतिकरण लगातार बढ़ता जा रहा है'
सवाल - ...तो क्या यूपी में पुलिस का राजनीतिकरण हो गया है?
जवाब- पुलिस का राजनीतिकरण लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके लिए पुलिस के अधिकारी भी दोषी हैं। नेता तो चाहेंगे कि पुलिस उनके गलत कामों पर ठप्पा लगाती जाए, उनके कार्यकर्ताओं के अनैतिक कामों को नजरअंदाज करे। पुलिस अधिकारियों में चारित्रिक बल नहीं रहा। उन्होंने एक पद पर बने रहने के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। एसएसपी कानपुर को हटाकर एसएसपी आजमगढ़ बना दिया जाए या क्राइम ब्रांच में भेज दिया जाए तो क्या उसकी तनख्वाह कम हो जाएगी? गलत तरीके से पैसा कमाने, व्यापारियों और दूसरे लोगों से चमचागीरी कराने के लिए अधिकारी हर तरह के समझौते कर रहे हैं।
सवाल - आपके केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को 10 साल हो गए लेकिन अभी तक पुलिस रिफॉर्म्स ही नहीं हो पाए?
जवाब- दुखद है कि जिस गंभीरता से पुलिस सुधार के लिए कार्रवाई होनी चाहिए थी, नहीं हुई। इस दिशा में केंद्र सरकार गंभीर नहीं है और राज्य सरकारें उदासीनता बरत रही हैं। पुलिस राज्य का विषय है। केंद्र सरकार से दिशा-निर्देश जारी होने चाहिए और राज्यों को आगे आना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा। यदि पुलिस सुधार हुए होते तो जाट आरक्षण आंदोलन में हरियाणा पुलिस बेबस, लाचार व अक्षम न दिखती।
छोटा होता जा रहा है डीजीपी का कार्यकाल
सवाल - डीजीपी का कार्यकाल भी छोटा होता जा रहा है?
जवाब- डीजीपी के कार्यकाल को लेकर यूपी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना ही नहीं, उसके साथ खिलवाड़ भी हो रहा है। एक से तीन माह के लिए डीजीपी नियुक्त होंगे तो वे सरकार के इशारे पर नाचेंगे। कार्यकाल बढ़ाने की उम्मीद में गलत काम भी करेंगे। हम लोग इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। कई जिलों में एक-एक दिन के लिए कप्तान बना दिए जाते हैं। स्टेट सिक्योरिटी कमीशन भी कागजों पर बनाया गया है। इसमें शामिल लोग अर्हता पूरी नहीं करते।
सवाल - ऐसे में पुलिस को सक्षम बनाने के लिए रास्ता क्या है?
जवाब- होना तो यह चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पुलिस सुधार की दिशा में बढ़ा जाए। एक लाख की आबादी पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए। आप 200 ही दे दीजिए। 118-120 से काम नहीं चलेगा। गुजरात में हर जिले में फोरेंसिक लेबोरेट्री है। यूपी में हर रेंज मुख्यालय पर ही यह लैब बना दीजिए। केसों के खुलासे और विवेचना में वैज्ञानिक सपोर्ट जरूरी है। गाड़ियों की कमी है, थानों के भवन जर्जर हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार कीजिए। इसके बाद नीति संबंधी निर्देशों का पालन करें। इसके बिना पुलिस सक्षम नहीं हो पाएगी।
'ट्रेनिंग सेंटरों को डंपिंग ग्राउंड बना दिया गया है'
सवाल - तो क्या पुलिस की ट्रेनिंग में भी बदलाव होना चाहिए?
जवाब - बिल्कुल। आप मुरादाबाद में पुलिस ट्रेनिंग सेंटर चले जाइए। जैसा प्रशिक्षण हम लोगों ने लिया है, वैसा ही अब भी मिल रहा है। जिन अफसरों को किनारे लगाना होता है, उन्हें पुलिस ट्रेनिंग सेंटर भेज दिया जाता है। गिरे हुए मनोबल के अफसर क्या प्रशिक्षण देंगे? बसपा सरकार में एसी शर्मा चार साल ट्रेनिंग सेंटर में रहे। सपा सरकार आई तो डीजीपी बना दिया। पुलिस ट्रेनिंग सेंटर को सरकारों ने डंपिंग ग्राउंड बना दिया है।
सवाल - यूपी में पुलिस सिपाही भर्ती के लिए लिखित परीक्षा खत्म कर दी गई है, इसका क्या असर होगा?
जवाब- नकल से पास होने वाले, फर्जी सर्टिफिकेट वाले पुलिस में घुस जाएंगे। इससे गुणवत्ता प्रभावित होगी। भारत पुनरोत्थान समिति इसके खिलाफ कोर्ट गई है।