पुराना लखनऊ खून के काले कारोबार का गढ़ बनता जा रहा है। कोहली ब्लड बैंक में जिन नाबालिगों का खून उतारकर बेचा जा रहा था,वो सभी पुराने लखनऊ के ही अलग-अलग इलाकों के हैं।
नाबालिगों को पांच सौ रुपये का लालच देकर कोहली ब्लड बैंक तक पहुंचाने वाला दलाल भी दुबग्गा इलाके का रहने वाला है। पर ये पहला मौका नहीं है,इससे पहले भी जब भी खून बेचने के धंधे का खुलासा होता है तो तार कहीं न कहीं इसी क्षेत्र से जुड़े।
डिमांड बढ़ी तो सक्रिय हो गया रैकेट
केजीएमयू जैसा बड़ा चिकित्सा संस्थान होने के कारण यहां ब्लड की डिमांड रहती है। इसी का फायदा धंधेबाजों ने उठाया। केजीएमयू के डॉक्टरों ने भी यहां अपने निजी चिकित्सा केंद्र खोल रखे हैं। कई नर्सिंग होम हैं।
ज्यादा फायदे और डिमांड के चलते यहां निजी ब्लड बैंक खुले। इसके साथ ही रैकेट सक्रिय हो गया। मामला दबा रहे इसलिए धंधेबाजों ने लोकल नेटवर्क बना लिया। धीरे-धीरे यहां से शहर के अन्य इलाकों के निजी अस्पतालों तक निजी ब्लड बैंकों ने पैठ बना ली।
डॉक्टरों ने एथिक्स को ठेंगा दिखाया तो फलने-फूलने लगा धंधा
खून बेचने के धंधे में 24 अगस्त 2009 को आशियाना के उमराई ब्लड बैंक में पेशेवर खून बेचने वालों के साथ बलरामपुर अस्पताल के एक डॉक्टर को भी पकड़ा गया था।
सरकारी डॉक्टर होने के बावजूद ये बगैर लाइसेंस ब्लड बैंक और कंपोनेंट बनाने का धंधा कर रहे थे। इस मामले में उन्हें निलंबित भी किया गया था। इनके साथी भी पुराने लखनऊ के अलग-अलग इलाकों के थे।
इसी तरह कोहली ब्लड बैंक चलाने वाले भी शहर की नामी चिकित्सक फैमिली थी। सब कुछ जानते हुए भी पैसा कमाने की धुन में इन लोगों ने मेडिकल एथिक्स ताक पर रखकर इसे बढ़ावा दिया।
सरकारी अस्पतालों के स्टाफ भी रैकेट में
खून बेचने के धंधे में बाहरी ही नहीं अस्पताल के कर्मचारी भी शामिल हो गए। बलरामपुर अस्पताल के ब्लड बैंक में रुपये लेकर रक्तदान करने गए वार्ड बॉय देवेंद्र और सफाईकर्मी दिनेश को पकड़ा गया था।
मरीज से रुपये लेकर खून देने का सौदा करने वालों के ब्लड बैंक पहुंचने पर उनकी पोल खुल गई थी। इसी तरह केजीएमयू में सिक्योरिटी गार्ड और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इस रैकेट में शामिल हैं।
एक सिक्योरिटी गार्ड भवानी सिंह को रुपये लेकर खून देने के आरोप में पकड़ा गया था। इस गार्ड का एक रिश्तेदार वहां का लैब टेकभनीशियन बताया जा रहा था। पकड़े जाने के बाद गार्ड को वहां से हटा दिया गया था।
कमजोरी होने का खतरा बताकर फंसाते हैं लोगों को
जागरूकता की कमी और दूरदराज के क्षेत्रों के मरीजों के पास रक्तदाता न होने के कारण पेशेवर रक्तदाताओं को धंधे का बढ़ावा मिल रहा है।
अधिकतर परिवारीजन पेशेवर रक्तदाता को साथ लेकर आते हैं। क्योंकि परिवारीजन रक्तदान करने से घबराते हैं। वहीं रक्त का नमूना और फार्म लेकर आते-जाते लोगों को देखकर ये पेशेवर रक्तदाता अपना शिकार फंसाते हैं।
लचीले कानून का मिल रहा फायदा
पेशेवर रक्तदाताओं को कानून के लचीलेपन का फायदा मिल रहा है। आईपीसी में खून बेचने का धंधे करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई धारा न होने के कारण किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती।
स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी के अनुसार राजधानी में रोजाना एक हजार यूनिट से अधिक रक्त की आवश्यकता है। इसके अनुपात में यहां के ब्लड बैंक मात्र 700 यूनिट खून ही उपलब्ध करा पा रहे हैं।
बाकी का 300 यूनिट ब्लड मरीजों को उपलब्ध कराने में पेशेवर रक्तदाताओं का ही योगदान है। केजीएमयू ब्लड बैंक की डॉ.तूलिका चंद्रा बताती हैं कि किसी भी ब्लड बैंक से रक्त लेने के लिए मरीज के परिवारीजन को रक्तदान करना आवश्यक है।
सरकारी ब्लड बैंकों में इस नियम का कड़ाई से पालन होता है। लावारिस मरीज को छोड़कर किसी को भी खून बगैर रक्तदान के नहीं दिया जा सकता। उन्होंने बताया कि जागरूकता न होने के कारण मरीज के परिवारीजन रक्तदान से घबराते हैं।