जबरन देह व्यापार में धकेली गई नाबालिग को अवैध तरीके से महिला थाने में कई दिन तक हिरासत में रखने और फिर मनमाने तरीके से महिला संरक्षण गृह भेजने के एक मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है।
अदालत ने आदेश दिए हैं कि पीड़िता को 30 जून से 17 अगस्त तक अवैध हिरासत में रखने पर उसे 3 हजार रुपये रोजाना के हिसाब से हर्जाना दें। हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह को आदेश दिए हैं कि वे 15 दिन में यह राशि कोर्ट में जमा करा दें जहां से इसे पीड़िता के खाते में भेजा जाएगा।
न्यायमूर्ति शबीहुल हसनैन व न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार जौहरी की खंडपीठ ने यह आदेश पीड़िता की मां की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया। याचिका में कहा गया कि पीड़िता को उसके पिता ने दो वर्ष पूर्व जिया नाम की एक महिला के हाथ बेच दिया था। यह महिला उसे मुंबई ले गई जहां उससे जबरन वेश्यावृत्ति कराई।
बाद में इस महिला ने पीड़िता को किसी और के हाथ बेच दिया। इन लोगों ने भी उससे वेश्यावृत्ति कराई। किसी तरह इनके चंगुल से छूट कर भागी पीड़िता को महाराष्ट्र के सिहोरा भवन भारवी की परगनाधिकारी ने शरण दी और उसे लखनऊ भेजने में सहायता की।
पीड़िता बीते जून में लखनऊ लौटी और 14 जून को लखनऊ के महिला थाने में एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पीड़िता को महिला संरक्षण गृह भेज दिया और उसका कलमबंद बयान भी दर्ज किया।
बाल कल्याण समिति ने पीड़िता को उसकी मां को सौंपा, पुलिस फिर थाने ले आई
मामला जब बाल कल्याण समिति के पास पहुंचा तो पीड़िता की मां ने उसे अपनी सुपुर्दगी में देने की गुजारिश की। इस पर जुवेनाइल कोर्ट ने 25 जून को पीड़िता को उसकी मां को सौंप दिया। सुपुर्दगी मिलने के बाद याची अपनी नाबालिग बेटी को लेकर उसी दिन अपने पैतृक जिले श्रावस्ती चली गई। अगले ही दिन 26 जून को लखनऊ महिला थाने की पुलिस ने याची से संपर्क कर पीड़िता को लखनऊ लाने को कहा।
आरोप है कि इसके बाद 28 जून को श्रावस्ती पुलिस ने याची को उसके घर जाकर धमकाया और पीड़िता को लखनऊ महिला थाने ले जाने का दबाव बनाया। याची पीड़िता को लेकर 30 जून को लखनऊ महिला थाने पहुंची और पुलिस ने उसकी बेटी को जबरन थाने पर रोक लिया।
जब याची ने विरोध किया तो उसे फर्जी मामले में फंसाने की धमकी दी गई व अभद्रता कर भगा दिया गया। याची ने दो जुलाई को डीजीपी को प्रत्यावेदन भेज कर अपनी बेटी की वापस दिलाने की गुजारिश की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
पुलिस पर मिलीभगत का आरोप
याची की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि उसे पीड़िता की सुपुर्दगी सक्षम अदालत से मिली थी और पीड़िता का बयान भी दर्ज हो चुका था ऐसे में उसे जबरन हिरासत में रखना गलत है। महिला थाने में पुलिस कर्मियों ने याची को मिले पीड़िता के सुपुर्दगी आदेश को छीन लिया।
यह भी आशंका जताई गई कि महिला थाने की पुलिस ने ऐसा बर्ताव देह व्यापार कराने वालों के इशारे पर किया। याचिका में कहा गया कि याची ने दो जुलाई को लखनऊ के एसएसपी को भी प्रत्यावेदन देकर जानकारी दी थी।
पीड़िता ने कोर्ट को बताई सच्चाई
कोर्ट ने इस मामले में पीड़िता को 17 अगस्त को पेश करने के निर्देश दिए थे। अदालत में पीड़िता ने बयान दिया कि उसे लखनऊ के महिला थाने में चार से पांच दिन तक अवैध हिरासत में रखा गया और फिर महिला संरक्षण गृह भेज दिया गया।
पीड़िता ने अदालत से उसे उसकी मां के साथ भेजने की गुजारिश की। इस पर अदालत ने उसे मां के सुपुर्द कर दिया। अदालत ने जब महिला थाने के पुलिसकर्मियों से पूछा कि पीड़िता को किस आधार पर थाने में हिरासत में रखा गया और किसके आदेश पर उसे महिला संरक्षण गृह भेजा गया, तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका।