लखनऊ के बीच बसा एक पूरा का पूरा मुहल्ला ड्योढ़ी आगामीर कहलाता है।
यहां के लोग आगामीर के नाम से एक होशियार और जबरदस्त वजीर की कल्पना करते हैं, जिससे इरादे उतने ही मजबूत हुआ करते थे जितने कि आज आगामीर की ड्योढ़ी के साथ इमामबाड़ा है।
आगामीर की ड्योढ़ी और इमामबाड़ा बाद में मलका जहां को विरासत में मिला। उनके बाद इसमें नवाब वाजिद अली शाह के वजीर अली नकी खां भी कुछ दिन रहे।
ड्योढ़ी की तमाम इमारतों में से काफी कुछ तबाह हो चुकी हैं और कुछ गिर रही हैं, उसके साथ के इमामबाड़े में राजकीय जुबली स्थापित है।
आगामीर का असली नाम सैयद मुहम्मद खां था जो मीर तकी तुर्कमानी के बेटे थे।
यह गाजीउद्दीन हैदर के बचपन के दोस्त्ा थे। इसलिए उन्होंने अपनी नवाबी में मिर्जा हाजी की जगह आगामीर को नायब बनाया था।
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जब नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने कंपनी सरकार को कुछ इलाके देकर बादशाहत पाई, तो ये वजीर कहलाए और इनके नवाब मोतमउद्दौला मुख्तार उल मुल्क सैयद मुहम्मद खां बहादुर उर्फ आगामीर का खिताब मिला।
ऐन शहर के सीने में आगामीर की ड्योढ़ी कायम हुई। आगामीर की सराय भी बनी। इतना ही नहीं विंगफील्ड पार्क के पास वाली करबला भी उसी वक्त बनवाई गई। जब ड्योढ़ी आगामीर बन रही थी, एक इत्र फरोश नवाब के दरवाजे आया।
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उसने कहा कि बड़ा नाम सुना था कि लखनऊ के लोग खूबसूरती और खुशबू के कद्रदान होते हैं लेकिन मुझे तो कोई भी ऐसा नहीं मिला जो मेरा इत्र खरीद सके।
आगामीर ने आन की शान में सारा इत्र खरीद लिया और राजगीरों को हुक्म दिया कि गारे में यह इत्र मिलाकर दीवारों को पलस्तर किया जाए। मशहूर है कि काफी सालों तक वो दीवारें इत्र की खुशबू बिखेरती रहीं।
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